आओ फिर से दिया जलाएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की यह कविता हमें निराशा में भी आशा की किरण देखने की प्रेरणा देती है। यह सिर्फ शब्द नहीं, जीवन का संदेश है।
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाईं से हारा।
अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ।
हम पड़ाव को समझे मंजिल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल।
वतर्मान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ।
आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा।
अंतिम जय का वज्र बनाने नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ,
आओ फिर से दिया जलाएँ।
अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता निराशा, हार और अंधकार के बीच आशा की लौ जलाने का संदेश देती है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि भले ही राह कितनी भी कठिन हो, फिर भी हमें हार नहीं माननी चाहिए।












प्रातिक्रिया दे