बात सीधी थी पर एक बार

कभी-कभी सरल बात भाषा में उलझकर पेचीदा हो जाती है। यह कविता बताती है कि सहज और ईमानदार भाषा ही बात को सही ताकत देती है।

बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फंस गई 

उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया

कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आये
लेकिन इससे भाषा के साथ-साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाए
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्योंकि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनायी दे रही थी
तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह-वाह 

आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था–
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।

हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया।

ऊपर से ठीक ठाक
पर अन्दर से
न तो उसमें कसाव था
न ताक़त।

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा –
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”

इस कविता में कवि यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि कभी-कभी कोई सरल बात भाषा में बाँधते-बाँधते इतनी उलझ जाती है कि वह और भी जटिल हो जाती है। शब्दों को तोड़-मरोड़कर प्रभाव जमाने की कोशिश में बात का असल भाव खो जाता है और वह खोखली हो जाती है। संदेश यह है कि भाषा का इस्तेमाल सहजता और ईमानदारी से होना चाहिए, वरना वह बात को व्यक्त करने के बजाय उसे बिगाड़ भी सकती है।

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