तेनालीराम की बुद्धिमानी: ‘कुछ नहीं’ की मजेदार कहानी
तेनालीराम की यह कहानी बताती है कि किस तरह उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और हाजिरजवाबी से ‘कुछ नहीं’ देकर दरबार में सभी को हंसा दिया।
तेनालीराम की बुद्धिमत्ता और हाजिरजवाबी से पूरा दरबार परिचित था। वे राजा कृष्णदेव राय के सबसे भरोसेमंद और प्रिय दरबारी थे। यही कारण था कि कई लोग उनसे जलते थे, क्योंकि राजा के मन में तेनाली के लिए अलग ही सम्मान था।
एक दिन, एक ईर्ष्यालु दरबारी ने तेनाली को राजा की नजरों में गिराने का निश्चय किया। सीधे आरोप लगाने से बात नहीं बनती, इसलिए उसने एक चाल चली। वह एक फल बेचने वाले के पास पहुँचा और उसे मुट्ठी भर सिक्के थमा दिए। फिर उसे सारी योजना बताई। योजना के अनुसार उसे तेनालीराम को फल बेचने थे।
अगले दिन, दरबार समाप्त होने के बाद जब तेनालीराम अपने घर की ओर लौट रहे थे, तब रास्ते में उनकी नजर उस फलवाले पर पड़ी। उन्हें याद आया कि घर में फल समाप्त हो चुके हैं, तो वे उसके पास रुक गए। ताजे फल देखकर उन्होंने कुछ खरीद लिए। जब उन्होंने दाम पूछा तो फलवाले ने कहा- “मेरे फलों का दाम है ‘कुछ नहीं’।”
तेनालीराम बहुत खुश हो गये। बिना कोई कीमत दिए इतने अच्छे फल मिल रहे थे, तो उन्होंने थैला भर लिया। लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, फलवाले ने आवाज दी- “अरे तेनाली जी, मेरे फलों का दाम तो दीजिए।”
तेनाली ने हैरानी से कहा- “अभी तो तुमने कहा था कि इन फलों का दाम कुछ नहीं है।”
फलवाला बोला- “हाँ, वही तो कह रहा हूँ, मेरे फलों का दाम है ‘कुछ नहीं’! अब आप सीधे-सीधे मुझे ‘कुछ नहीं’ दे दीजिए, वरना मैं राजा के पास शिकायत करूँगा…”
तेनालीराम सोच में पड़ गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब इस फलवाले का दाम कैसे चुकाया जाए। यही सोचते-सोचते वे बिना कुछ कहे घर लौट गए।
बस, फिर क्या था…अगली सुबह, फलवाला सीधा राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुँचा और ऊँची आवाज में बोला- “महाराज, आपके दरबारी तेनालीराम ने मेरे साथ छल किया है! उन्होंने मुझसे फल खरीदे, पर मेरे फलों का दाम मुझे नहीं दिया।”
राजा चौंककर बोले- “ये तुम क्या कह रहे हो, तेनाली ऐसा कर ही नहीं सकते।”
लेकिन फलवाला अड़ा रहा- “उन्होंने ऐसा किया है महाराज, और अब आपको मुझे न्याय दिलाना होगा।”
राजा ने तुरंत तेनाली को बुलवाया। तेनाली पूरी तरह तैयार आए थे। वे एक बड़ा-हा खूबसूरत, रत्नजड़ित संदूक लेकर आए और फलवाले से कहने लगे- “मैंने तुम्हारे फलों का दाम इसी संदूक में रखा है। इसे खोलकर अपने फलों का दाम ले लो।”
फलवाला संदूक देखकर लालच में आ गया। उसने मन ही मन सोचा- “इतने बड़े संदूक में जरूर सोना-चाँदी, हीरे-मोती होंगे…”
उत्साह में उसने झटपट संदूक खोला, लेकिन अंदर कुछ भी नहीं था। वह हक्का-बक्का रह गया और बोला- “ये क्या, इसमें तो कुछ नहीं है!”
तेनाली मुस्कुराकर बोले- “बिलकुल, यही तो तुम्हारे फलों का दाम था, ‘कुछ नहीं’। अब तुम इसमें से अपना ‘कुछ नहीं’ ले लो और यहाँ से चलते बनो।”
पूरा दरबार ठहाकों से गूँज उठा। राजा भी हँस पड़े।
फलवाले को शर्मिंदा होकर वापस जाना पड़ा, और जिस दरबारी ने यह षड्यंत्र रचा था, उसका चेहरा गुस्से और जलन से लाल पड़ गया।
अंत में, तेनालीराम की जय-जयकार हुई और राजा ने उन्हें पुरस्कृत किया।












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