असली सुख

यह प्रेरणादायक कहानी दो चिड़ियों के माध्यम से सिखाती है कि असली सुख दूसरों की दिखावटी ज़िंदगी में नहीं, बल्कि हमारी खुद की आज़ादी और संतोष में होता है।

एक जंगल में चिक्कू और मीना नाम की दो चिड़िया रहती थीं। दोनों एक-दूसरे की पक्की दोस्त थीं। हर सुबह वे अपने घोंसले से निकलकर दाना-पानी का इंतजाम करने दूर-दूर तक जाती और शाम होते ही घर वापस आ जाती। इसी प्रकार दोनों की दिनचर्या चल रही थी।

एक सुबह जब चिक्कू मीना को साथ चलने के लिए बुलाने आयी तो मीना ने उससे कहा- “चिक्कू, रोज-रोज दाना पानी के लिए इतनी मेहनत क्यों करनी पड़ती है? उन पिंजरे वाले पक्षियों को देखो, उनका जीवन कितना अच्छा होता है। उनके मालिक उनके लिए दाना-पानी पहले से ही रख देते हैं। न किसी प्रकार की कोई मेहनत और न ही दाना पानी की चिंता। कितना सुख और आराम है उनकी जिंदगी में…

चिक्कू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- “मीना, ये तुम्हारी भूल है। उनकी जिंदगी में आराम नहीं, सिर्फ कैद है। वे हमारी तरह खुले आसमान में उड़ नहीं सकते, आजाद हवा में साँस नहीं ले सकते। हमें दाना पानी के लिए मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन हम अपनी मर्जी से उड़ सकते हैं, जहाँ चाहें वहाँ जा सकते हैं। उनकी जिंदगी में ये आज़ादी नहीं है।

मीना चिक्कू की बात को नकारते हुए कहने लगी- “तुम चाहे जो भी कहो, मुझे तो उनकी सुकून भरी जिंदगी ही बेहतर लगती है।

जब दाना पानी के लिए चलने की बात आई तो मीना कहने लगी- “नहीं, तुम अकेली चली जाओ चिक्कू। आज मैं यहीं पेड़ पर आराम करूँगी। मेरे लिए भी थोड़ा दाना-पानी ले आना।

चिक्कू ने बहुत समझाया लेकिन मीना नहीं मानी। आखिरकार चिक्कू अकेले ही दाना-पानी की तलाश में निकल पड़ी।

इधर मीना पेड़ पर बैठी आराम फरमा रही थी के तभी वहाँ एक शिकारी आ गया। मीना को शिकारी की मौजूदगी की बिल्कुल भनक नहीं थी। इसी बात का फायदा उठाते हुए शिकारी ने झट से मीना को अपने जाल में फँसा लिया और उसे अपने साथ ले गया।

घर ले जाकर उसने मीना को एक पिंजरे में बंद कर दिया। मीना अब उस पिंजरे में कैद थी, जिसे शिकारी ने अपने घर के बाहर लटका दिया था। पिंजरे में दाना-पानी रखा हुआ था। मीना सोचने लगी कि अब उसे दाना-पानी के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। सब कुछ उसे पहले से ही तैयार मिल जाया करेगा। जिस प्रकार की जिंदगी को वो बेहतर मानती थी, अब उसी प्रकार की जिंदगी वो जी रही थी।

उधर शाम को दाना पानी का बंदोबस्त करके जब चिक्कू वापस लौटी तो उसने देखा कि मीना वहाँ नहीं थी। वह घबरा गई। वह हर जगह मीना को ढूँढने लगी, लेकिन मीना उसे कहीं दिखाई नहीं दी। चिक्कू ने हार नहीं मानी, उसने अपनी तलाश जारी रखी।

यहाँ मीना के भी हाल अब अच्छे नहीं थे। शुरुआत में तो वह इस कैद भरी जिंदगी से बहुत खुश थी, लेकिन कुछ ही समय में उसे पिंजरे की ये तंगी खलने लगी। पिंजरे में रहकर उसे घुटन-सी महसूस होती थी। अब उसे अपनी आजादी वाली जिंदगी की याद आने लगी। वो फिर से उसी जिंदगी को जीना चाहती थी।

इधर कई दिनों तक लगातार तलाश करने के बाद आखिरकार चिक्कू शिकारी के घर तक पहुँच ही गई जहाँ मीना पिंजरे में कैद थी। जब चिक्कू ने मीना को देखा तो उसकी साँस में साँस आई, लेकिन अब चिक्कू को मीना को उस बंधन से आजाद कराना था।

चिक्कू ने अपनी बुद्धि से काम लिया। वह दूर पेड़ पर बैठकर रात होने का इंतजार करने लगी। जब रात हुई और शिकारी घर के भीतर सोने चला गया, तब मौका पाकर चिक्कू ने उस पिंजरे की कुंडी खोल दी और मीना को पिंजरे से आज़ाद कर दिया। अब दोनों साथी एकसाथ आजाद होकर उड़ रहे थे, खुली हवा में साँस ले रहे थे। किसी प्रकार का कोई बंधन उनपर नहीं था।

जब दोनों आसमान में खुले पंखों के साथ उड़ रही थीं तब चिक्कू ने मीना से पूछा- “तो मीना अब बताओ, असली सुख किसकी जिंदगी में है?

मीना ने उत्तर दिया- “असली सुख हमारी खुदकी जिंदगी में है। आज मुझे समझ आ गया है कि दूसरों की जिंदगी में सुख की तलाश करने के बजाय हमें अपने जिंदगी में मौजूद खुशियों को खुलकर जीना चाहिए। जब हम दोनों दिनभर दाना-पानी के लिए मेहनत करके शाम को घर लौटते हैं तो थकान के कारण कम से कम सुकून की नींद तो हमें नसीब होती है, वहाँ पिंजरे में तो चैन की नींद भी नहीं आती थी।

मीना की बात सुनकर चिक्कू संतोष के साथ मुस्कुराई। दोनों अब अपने गंतव्य की तरफ चल पड़ीं।

मीना की ही तरह हम इंसान भी खुद की जिंदगी में मौजूद खुशियों को खुलकर जीने के बजाये दूसरों की जिंदगी में सुख तलाशते हैं। हम अक्सर दूसरों की जिंदगी को देखकर यह सोचते हैं कि उनकी जिंदगी हमसे बेहतर है लेकिन हमारी जिंदगी कितनी बेहतर है, इसकी पहचान करना हम भूल जाते हैं।

इसलिए दूसरों की जिंदगी में सुख तलाशने के बजाय अपनी जिंदगी के छोटे-छोटे सुखों में संतोष पाना सीखें। यही हमारे जीवन का ‘असली सुख’ है।

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