नेकी का फल: सच्ची मदद का सच्चा इनाम

मुंबई की भीड़ में अर्जुन ने एक बुज़ुर्ग की मदद की। यही नेकी आगे चलकर उसे ज़िंदगी का सबसे बड़ा इनाम दे गई। पढ़िए यह दिल छू लेने वाली कहानी।

सुबह के साढ़े 9 बजे थे। मुंबई की लोकल ट्रेन में रोज की तरह ही भीड़ थी। हर कोई अपने-अपने काम पर निकलने की जल्दी में था। अर्जुन भी उन्हीं में से एक था- वह मुंबई की ही एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंट असिस्टेंट था।

रोज की तरह आज भी वह जल्दी में था। वह स्टेशन तक दौड़ते हुए पहुँचा ही था कि तभी उसने देखा कि एक बुजुर्ग व्यक्ति प्लेटफॉर्म पर गिर पड़े हैं। कई लोग उन्हें देखकर भी आगे बढ़ गए। कोई उनकी मदद नहीं कर रहा था। यह देख अर्जुन को बहुत बुरा लगा। वह भागकर गया और उस बुजुर्ग व्यक्ति को उठाया। पैर फिसलने की वजह से उन्हें सिर पर हल्की सी चोट लगी थी।

“दादाजी, आप ठीक तो हैं न?”- अर्जुन ने सवाल किया।

“ठीक हूँ बेटा, बस हल्की सी चोट लगी है, दवा लग जाएगी तो ठीक हो जाऊँगा।”

“अच्छा तो चलिए मैं आपका इलाज करवा देता हूँ।”

“अरे नहीं-नहीं बेटा, तुम क्यों तकलीफ ले रहे हो! मेरे कारण तुम अपना समय मत नष्ट करो”

बुजुर्ग व्यक्ति ने काफी समझाया लेकिन अर्जुन नहीं माना। सबसे पहले अर्जुन उस बुजुर्ग व्यक्ति को पास के क्लिनिक ले गया, इलाज करवाया, फिर रिक्शा में उन्हें घर तक छोड़ने भी गया।

वहाँ अर्जुन की पहली बार उनके बेटे वैभव से मुलाकात हुई। वैभव अपने पिता को ऐसी हालत में देखकर घबरा गया, तरह-तरह के सवाल किए, तब उसके पिताजी ने उसे शांति से सारी बात बताई कि कैसे अर्जुन ने उनकी सहायता की।

सारी बात जानकर वैभव ने अर्जुन से कहा- “आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। आपने मेरी बहुत बड़ी मदद की है…”

अर्जुन मुस्कराकर बोला- “कोई बात नहीं, ये तो मेरा फर्ज था…अच्छा, मुझे देर हो रही है, अब मैं चलता हूँ।”

ऐसा कहकर अर्जुन वहाँ से चला गया। ऑफिस पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो चुकी थी। डिपार्टमेंट के हेड, शर्मा जी आज बहुत गुस्से में थे। अर्जुन के आते ही वे उस पर बरस पड़े। अर्जुन ने उन्हें समझाने की खूब कोशिश की, लेट आने का कारण भी बताया लेकिन शर्मा जी ने उसकी एक न सुनी।

देरी से आने की सजा के तौर पर उन्होंने अर्जुन की अगले महीने की सारी छुट्टियाँ रद्द कर दीं। शर्मा जी डिपार्टमेंट के हर वर्कर के साथ यही रवैया रखते थे। कोई जरा भी लेट आ जाए तो उस पर सख्त ऐक्शन लेते थे, इसलिए सभी वर्कर्स उनसे नाखुश रहा करते थे।

कुछ हफ्तों बाद कंपनी में नए CFO की नियुक्ति हुई। सभी कर्मचारी उत्साहित थे क्योंकि आज वो पहली बार पूरे डिपार्टमेंट से मिलने आ रहे थे। मीटिंग रूम में सभी वर्कर्स और डिपार्टमेंट हेड शर्मा जी मौजूद थे। जब मीटिंग रूम में नए CFO आए तो अर्जुन उन्हें देखकर चौंक गया। नया CFO कोई और नहीं बल्कि वैभव था। वही वैभव जिसके पिताजी की अर्जुन ने मदद की थी।

इसके बाद शर्मा जी सभी से नये CFO की पहचान करवाने लगे, तभी वैभव की नजर अर्जुन पर पड़ी। उसने तुरंत अर्जुन को पहचान लिया। अर्जुन ने भी वैभव को अपनी तरफ से बुके देकर ग्रीट किया।

इसके बाद मीटिंग शुरू हुई। पिछले 3 महीनों का फाइनैंस रिकॉर्ड टेबल पर मंगाया गया। जब वैभव ने रिकॉर्ड अच्छे से एनालाइज किया तो उसमें काफी गड़बड़ नजर आई। कई वर्कर्स की पेमेंट पेंडिंग थी, फाइनैंस का पूरा ब्योरा भी ठीक तरह से मेंशन नहीं था।

ये सारी गड़बड़ देखकर उसे डिपार्टमेंट के हेड शर्मा जी पर शक हुआ। सख्ती से पूछताछ करने पर शर्मा जी ने कबूल किया कि पुराने CFO के साथ मिलकर वे फाइनेंस में हेराफेरी करते थे। इसी वजह से कई कर्मचारियों की सैलरी और प्रोजेक्ट्स की पेमेंट भी समय पर नहीं हो पा रही थी।

वैभव ने तुरंत शर्मा जी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। नए CFO के इस निर्णय से सभी कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गई। आखिरकार उन्हें शर्मा जैसे हेड से मुक्ति जो मिल गई थी।

किन्तु अब वैभव के सामने यह समस्या थी कि डिपार्टमेंट का नया हेड किसे बनाया जाए। इस निर्णय हेतु वैभव ने सभी कर्मचारियों के अब तक के कार्य विवरण को जाँचना शुरू किया।

दो दिन बाद वैभव ने अर्जुन को अपने केबिन में बुलाया और कहा- “अर्जुन, डिपार्टमेंट को एक ईमानदार और मेहनती हेड की जरूरत है। तुम्हारा काम देखकर मैं ये कह सकता हूँ कि तुम बहुत ही ईमानदार और मेहनती व्यक्ति हो…

..साथ ही जिस तरह उस दिन तुमने मेरे पिताजी की मदद की थी, उससे ये साबित होता है कि तुम खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचते हो और हमें ऐसा ही व्यक्ति चाहिए जो खुद के हित से पहले कंपनी के हितों को रखे। इसलिए मैं तुम्हें फाइनैंस डिपार्टमेंट का हेड नियुक्त करता हूँ। मुझे पूरा भरोसा है कि तुम इस भूमिका को पूरी लगन और ईमानदारी से निभाओगे।”

यह सुनते ही अर्जुन की आँखें नम हो गयीं। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। कल तक जहाँ वह कंपनी का एक मामूली-सा कर्मचारी था, अब वह फाइनैंस डिपार्टमेंट का हेड बन चुका था।

यह अर्जुन के उन्हीं अच्छे कर्मों का फल था, जो वह जीवन भर करता आया था। नैकी कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब हम बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करते हैं, तो समय आने पर उसका फल हमें जरूर मिलता है।


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