तेनालीराम ने तोड़ा घमंडी जादूगर का घमंड

विजयनगर दरबार में आया एक घमंडी जादूगर, जिसने सबको चौंका दिया। लेकिन तेनालीराम ने अपनी चतुराई से उसका घमंड चकनाचूर कर दिया।

एक दिन विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक अनोखा जादूगर आया। उसने घंटों तक तरह-तरह के अद्भुत करतब दिखाकर सबको चकित कर दिया – कभी खाली कटोरे में फूल खिला देता, तो कभी सिक्कों को हवा में नचा देता। सभी तालियाँ बजा-बजा कर उसकी कला की सराहना कर रहे थे।

प्रदर्शन के अंत में, राजा से ढेर सारे उपहार पाकर, वह अपने हुनर के घमंड में आ गया। मुस्कराकर उसने राजा से सवाल किया- “महाराज, क्या आपके दरबार में कोई ऐसा व्यक्ति है जो मेरे जितना अद्भुत करतब दिखा सके? कोई है जो मुझे टक्कर दे सके?”

राजा ने अपने दरबारियों की ओर देखा। हर तरफ सन्नाटा था। किसी के पास इसका उत्तर नहीं था। तभी राजा की नजर तेनालीराम पर पड़ी।

“तेनाली, क्या तुम कुछ कर सकते हो?”

तेनालीराम मुस्कुराए और बोले- “महाराज, कर तो सकता हूँ, पर उसके लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए।”

राजा ने गंभीर स्वर में कहा- “ठीक है, तुम्हें कल तक का समय दिया जाता है।”

दरबार समाप्त होने के बाद, महाराज ने तेनालीराम को अपने कक्ष में बुलाकर कहा- “तेनाली, कल तुम्हें किसी भी हालत में इस जादूगर का घमंड तोड़ना होगा। यह हमारे दरबार की प्रतिष्ठा का प्रश्न है।”

तेनालीराम ने सिर झुका कर आश्वासन दिया और महल से बाहर चले गये। शाम को घर लौटते वक्त, वह रास्ते भर यही सोचते रहे कि कल क्या किया जाए? तभी रास्ते में उन्हें कुछ बच्चे दिखाई दिए, जो रेत से खेल रहे थे। वे रेत के साथ तरह-तरह के करतब कर रहे थे। बस, तेनालीराम के दिमाग कि बत्ती जल उठी। उन्हें समझ आ गया कि कल क्या करना है।

अगले दिन जब दरबार सजा, तो तेनालीराम एक छोटी पोटली में रेत भरकर वहाँ पहुँच गए। कुछ देर बाद राजा ने आदेश दिया- “तेनाली, अब अपना करतब दिखाओ।”

तेनालीराम ने जादूगर की ओर देखकर कहा- “मैं जो काम आँखें बंद करके करूँगा, अगर आप वही काम खुली आँखों से कर दिखाओ, तो मैं अपनी हार स्वीकार कर लूँगा।”

यह सुनते ही जादूगर मन ही मन मुस्कुराने लगा। उसे लगा कि यह तो बहुत आसान है। उसने तुरंत चुनौती स्वीकार कर ली।

इसके बाद तेनालीराम ने अपनी आँखें कसकर बंद कीं और एक मुट्ठी रेत अपनी आँखों पर डाल दी। थोड़ी देर बाद उन्होंने रेत झटककर कपड़े से आँखें पोंछीं और फिर मुस्कुराकर बोले- “अब आपकी बारी है जादूगर जी। आपको यही करतब खुली आँखों से करना है।”

जादूगर का चेहरा उतर गया। उसे अपनी भूल का एहसास हो गया। उसने शर्मिंदा होकर हाथ जोड़ लिए और राजा से माफी माँगते हुए दरबार से बाहर चला गया।

महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम की बुद्धि और चतुराई की खूब प्रशंसा की और उन्हें इनाम देकर सम्मानित किया।

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