तेनालीराम और खोई हुई अंगूठी

“तेनालीराम और खोई हुई अंगूठी” एक मनोरंजक कहानी है जो बताती है कि कैसे तेनालीराम ने अपनी चतुराई से राजा की अंगूठी चुराने वाले चोर को बेनकाब किया।

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय अपने शाही वैभव और विलक्षण बुद्धिमत्ता के लिए जाने जाते थे। वह हमेशा एक बहुमूल्य, रत्नों से जड़ी हुई अंगूठी पहनते थे — जो उनकी सबसे प्रिय वस्तु थी। जब भी वे दरबार में उपस्थित होते, उनकी नज़र बार-बार उस चमकती अंगूठी पर जा टिकती थी। यहां तक कि आने वाले मेहमानों और मंत्रियों से भी वे गर्वपूर्वक उसकी चर्चा किया करते थे।

एक दिन महाराज कुछ उदास होकर अपने सिंहासन पर बैठे थे। तभी तेनालीराम वहाँ आ पहुंचे। महाराज के चेहरे पर उदासी देखकर उन्होंने आदरपूर्वक प्रश्न पूछा – महाराज, आज आप इतने उदास क्यों हैं?

महाराज ने गहरी साँस लेते हुए कहा – “तेनाली, मेरी सबसे प्यारी अंगूठी गुम हो गई है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसे मेरे बारह अंगरक्षकों में से किसी एक ने चुराया है। मेरे सिवा और कोई उस तक पहुँच ही नहीं सकता था।”

तेनालीराम ने तुरंत उत्तर दिया – “महाराज, चिंता मत कीजिए। मैं चोर का पता जल्द ही लगा लूँगा।”

राजा के चेहरे पर हल्की मुस्कान लौट आई और उन्होंने तुरंत सभी बारह अंगरक्षकों को बुलवा लिया। तेनालीराम ने गंभीर स्वर में सभी अंगरक्षकों से कहा – “हमें पता है कि राजा की अंगूठी आप लोगों में से किसी एक ने चुराई है। जो निर्दोष है उसे डरने की आवश्यकता नहीं, परंतु जिसने अपराध किया है उसे कठोर दंड मिलेगा।”

थोड़ी देर रूककर तेनालीराम बोले – “अब आप सब मेरे साथ काली माता के मंदिर चलिए।”

यह सुन राजा थोड़े हैरान हुए – “तेनाली! हमें तो चोर पकड़ना है, मंदिर क्यों जा रहे हो?”

तेनाली मुस्कुराए और बोले – “महाराज, बस थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए।”

मंदिर पहुँचने पर उन्होंने पुजारी से कुछ धीमे स्वर में बातें कीं। फिर अंगरक्षकों से बोले – “आप सभी बारी-बारी से माँ काली की मूर्ति के चरण स्पर्श कर बाहर आ जाइए। ऐसा करने से माँ काली आज रात स्वप्न में आकर मुझे उस चोर का नाम बता देंगी।

इसके बाद एक-एक कर सभी अंगरक्षक अंदर गए, माँ काली के पैर छुए और फिर लौटकर बाहर खड़े हो गए। हर बार जब कोई बाहर आता, तेनालीराम उसके हाथों को सूँघते और फिर उसे कतार में खड़ा कर देते।

जब बारहों अंगरक्षक पंक्ति में खड़े हो गए, तो राजा ने पूछा – “तेनाली, अब तो जवाब कल सुबह ही मिलेगा न?”

तेनाली हँसते हुए बोले – “नहीं महाराज, चोर का भेद तो खुल गया है। सातवें स्थान पर खड़ा सैनिक ही असली दोषी है!”

यह सुनते ही वह अंगरक्षक घबराकर भागने लगा, लेकिन सैनिकों ने तुरंत उसे पकड़ लिया। राजा अचंभित होकर बोले – “तेनाली! तुमने बिना किसी स्वप्न के कैसे जान लिया कि यही चोर है?”

तेनालीराम ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया – “महाराज, मैंने पुजारी से कहकर माँ काली के चरणों पर सुगंधित इत्र छिड़कवा दिया था। जिसने वास्तव में चरण स्पर्श किए, उसके हाथों में उस इत्र की महक आ गई। लेकिन जब मैंने सातवें अंगरक्षक के हाथ सूंघे, उनमें कोई सुगंध नहीं थी। असल में डर के कारण उसने मूर्ति को छुआ ही नहीं और इसी से सिद्ध हो गया कि वही अपराधी है।”

राजा कृष्णदेव राय तेनालीराम की बुद्धिमत्ता से अत्यंत प्रसन्न हुए। एक बार फिर उन्होंने उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से पुरस्कृत किया।

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