पिता का जन्मदिन: बेटी का प्यार भरा सरप्राइज
पिता का जन्मदिन जब सबको भूल जाता है, तो एक बेटी अपने प्यार और योजना से उस दिन को उनके जीवन का सबसे यादगार पल बना देती है।
राकेश बाबू अपने कमरे में मायूस बैठे हैं। मायूसी का कारण यह है कि आज उनका जन्मदिन है और अब तक किसी ने उन्हें बधाई नहीं दी। जब सुबह उठे तो सोचा था कि घरवाले उन्हें जन्मदिन की बधाई देंगे। आशा थी कि उनकी पत्नी और एकलौती बेटी सर्वप्रथम उन्हें बधाई देंगी और मिठाई खिलाएँगी। घर को अच्छी तरह से सजाया जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सब कुछ रोज की तरह ही था। उनकी इच्छानुसार कोई भी परिवर्तन उन्हें दिखाई नहीं पड़ा।
पत्नी खाना बना रही थी। उसके पास जाकर जब उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि मोहतरमा को अपने पतिदेव का जन्मदिन याद है या नहीं, तो पता चला कि उसे तो कुछ भी स्मरण नहीं। अब वे अपनी पुत्री के कमरे में गए। वह पढ़ाई कर रही थी। बातों-बातों में उससे भी सवाल किया तो जाना कि उसे भी कुछ याद नहीं है।
फिर राकेश बाबू घर के आँगन में कुर्सी डालकर बैठ गए। सोचा कि आस-पड़ोस से कोई न कोई मित्र या कोई पड़ोसी उन्हें बधाई देने अवश्य आएगा। उनका कोई मित्र या पड़ोसी तो नहीं आया, लेकिन पेपरवाला जरूर आया था – और वह भी केवल पेपर देकर, बधाई दिए बिना ही चला गया।
खैर, जब ऑफिस पहुँचे तो लगा कि उनके सहकर्मियों को तो उनका जन्मदिन याद होगा। लेकिन वहाँ पर भी वही हाल पाया। किसी को उनका जन्मदिन याद नहीं था।
“भले ही किसी और को मेरा जन्मदिन याद नहीं है, लेकिन मेरी पत्नी और मेरी बच्ची को भी यह बात याद नहीं! जिन लोगों के लिए मैं नौकरी करता हूँ, काम करता हूँ, दिनभर इतनी भागदौड़ और मेहनत करता हूँ, क्या उनसे केवल इतनी उम्मीद मैं नहीं रख सकता कि उन्हें आज का दिन याद हो?” — राकेश बाबू अपने केबिन में बैठे, यही सब बातें सोच रहे थे।
इन्हीं सोच-विचारों में समय बीत गया। घर जाने का समय कब हो गया, यह उन्हें पता ही नहीं चला। अपने केबिन को ताला लगाकर जब वे बाहर आते हैं, तो देखते हैं कि वहाँ कोई नहीं था। गार्ड से जब उन्होंने पूछा, तो पता चला कि सभी लोग एक घंटे पहले ही यहाँ से चले गए हैं। उन्हें कुछ समझ नहीं आया कि आज सब इतनी जल्दी क्यों चले गए?
खैर, गाड़ी स्टार्ट करके वे घर के लिए रवाना हो गए। घर पहुँचकर देखा कि घर के बाहर कई सारी गाड़ियाँ खड़ी हैं। आज घर काफी जगमगा रहा था। एक पल के लिए तो उन्हें लगा कि वे किसी गलत पते पर आ गए हैं, लेकिन जब अपने आजू-बाजू नजर दौड़ाई, तो समझ आया कि यह पता भी सही है और यह घर भी उन्हीं का है।
भीतर पहुँचे, तो देखा कि घर के आँगन में काफी लोग मौजूद हैं। सभी ने अच्छे-अच्छे कपड़े पहने हुए थे। ऐसा लग रहा था मानो किसी फंक्शन में आए हों। यह सब चकाचौंध देख राकेश बाबू इतने हैरान हो गए कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि आज उनका जन्मदिन है। जब उन्होंने इस भीड़ में चेहरे पहचानने की कोशिश की, तो नजर आया कि इनमें से कुछ चेहरे उनके रिश्तेदारों के हैं, कुछ उनके मित्र, कुछ पड़ोसी और कुछ चेहरे तो उन सहकर्मियों के भी थे, जो आज ऑफिस से जल्दी चले गए थे।
इसी बीच उनकी पत्नी और उनकी बेटी वहाँ आती हैं। उन दोनों ने भी अच्छे कपड़े पहने हुए थे। राकेश बाबू के आश्चर्य से भरे चेहरे को देखकर उनकी पत्नी कहने लगी – “इतना आश्चर्य से क्या देख रहे हैं? आज आपका जन्मदिन है न, भूल गए!”
तब कहीं जाकर राकेश बाबू को स्मरण होता है कि आज तो उनका जन्मदिन है और वे समझ जाते हैं कि ये सारे लोग उनका जन्मदिन मनाने वहाँ आए हैं। लेकिन राकेश बाबू अभी भी उलझन में थे। वे यह समझ नहीं पा रहे थे कि सुबह तो किसी को याद नहीं था, कि आज उनका जन्मदिन है। फिर अचानक सबको कैसे याद आ गया?
अपने पिता की यह परेशानी दूर करते हुए उनकी बेटी कहती है – “पापा, हमें याद था कि आज आपका जन्मदिन है। हम तो बस आपको सरप्राइज देना चाहते थे, इसलिए यह नाटक किया। कल ही माँ ने सभी पड़ोसियों और रिश्तेदारों को यह बता दिया था कि कोई भी आपको फोन करके या घर आकर बधाई न दे। मैंने भी आपके दोस्तों को और ऑफिस में फोन करके सरप्राइज वाली बात बता दी थी और सबसे कहा था कि कोई भी आपको जन्मदिन के लिए विश न करे।”
अब जाकर राकेश बाबू को समझ आया कि आज ऑफिस से सब लोग जल्दी क्यों चले गए थे और क्यों उनका कोई मित्र या कोई पड़ोसी उन्हें बधाई देने नहीं आया। उनकी पत्नी कहने लगी – “यह सारी सोच आपकी बेटी की है। उसी ने मुझसे कहा था कि आपको सरप्राइज देना है और सारी तैयारियाँ भी उसी ने की हैं।”
राकेश बाबू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। आज वे अपनी बेटी से बहुत प्रसन्न थे। उन्हें समझ आ गया था कि उनका परिवार उनसे कितना प्यार करता है। अपनी बेटी और अपनी पत्नी के प्रति जो संदेह राकेश बाबू के मन में थे, वे भी अब दूर हो चुके थे। इसी बीच उनकी पत्नी कहती है – “अब आप खड़े क्या हैं, केक आने में अभी थोड़ा समय है, तब तक आप जाकर तैयार हो जाइए।”
राकेश बाबू तैयार होने चले जाते हैं। वे खुश हैं कि उनके परिवार को और उनके बाकी करीबियों को उनका जन्मदिन याद था।
“मेरी बेटी ने मेरे लिए कितना अच्छा सरप्राइज प्लान किया है। उसने हर मुमकिन कोशिश की है जिससे मेरे चेहरे पर खुशी आ सके। मैं कितना खुशनसीब बाप हूँ जो मुझे इतनी प्यारी बेटी मिली है।” – राकेश बाबू अपने कमरे में बैठे यही बातें सोच रहे थे।
इसी बीच उनकी पत्नी वहाँ आती हैं – “आप यहाँ बैठे-बैठे क्या कर रहे हैं? चलिए, केक आ गया है। सब इंतज़ार कर रहे हैं।”
राकेश बाबू बाहर आकर केक काटते हैं। पहला हिस्सा लेकर वे अपनी बेटी को खिलाते हैं। तभी उनकी बेटी को अपने पिता की आँखों में आँसू दिखाई पड़ते हैं। वह कहती है – “पापा ये क्या! आपकी आँखों में आँसू क्यों हैं? क्या हुआ?”
“कुछ नहीं बेटी, ये तो खुशी के आँसू हैं। कभी-कभी खुशी में भी आँसू आ जाते हैं बेटा!”
बेटी अपने पिता के आँसू पोंछते हुए कहती है – “आँसू चाहे खुशी के हों या गम के, आपकी आँखों में बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते पापा।”
अपनी बेटी की यह बात सुनकर राकेश बाबू उसे गले लगा लेते हैं। इस दृश्य को बयान कर पाना अब मेरे लिए भी कठिन हो रहा है। पिता और पुत्री के इस असीम प्रेम का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता…












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