समय की समझ (समय का मूल्य)
यह कहानी “समय का मूल्य” बच्चों को सिखाती है कि कैसे समय की कद्र करना जीवन में सफलता की पहली सीढ़ी है। एक प्रेरक और रोचक कथा।
गाँव के एक स्कूल में पढ़ने वाला राहुल बहुत चंचल और होशियार बच्चा था। लेकिन उसे पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह स्कूल से आते ही बैग को एक कोने में फेंक देता और सीधा दोस्तों के साथ खेलने चला जाता। दिनभर उसका समय क्रिकेट, पतंगबाज़ी और गिल्ली-डंडा खेलने में निकल जाता।
माँ रोज़ उसे प्यार से समझाती थीं –
“राहुल, समय बहुत कीमती होता है। अभी जो समय तुम खेल में बर्बाद कर रहे हो, वही आगे चलकर तुम्हारे भविष्य का आधार बनेगा।”
राहुल हँसकर कहता –
“अभी तो खेलने की उम्र है माँ, पढ़ाई तो बाद में भी हो जाएगी।”
राहुल का दोस्त अजय भी उसके साथ ही पढ़ता था, लेकिन वह समय का पक्का था। वह हर काम समय पर करता – स्कूल, होमवर्क, खेल और आराम – सब कुछ एक तय समय के अनुसार। राहुल उसे देखता जरूर था, लेकिन कभी गंभीरता से नहीं लेता।
समय बीतता गया और साल के अंत में परीक्षाएँ आ गईं। सभी बच्चे पढ़ाई में लग गए, लेकिन राहुल को लग रहा था कि कुछ दिन में सब तैयार कर लेगा। लेकिन जब उसने किताबें खोलीं, तो उसे कुछ भी समझ नहीं आया। अब उसे डर सताने लगा। रात-रात भर जागकर पढ़ने की कोशिश की, लेकिन जो समय उसने गँवाया था, वह वापस नहीं आ सका।
परीक्षा समाप्त हुई और कुछ हफ्तों बाद परिणाम आया।
अजय पूरे स्कूल में प्रथम स्थान पर आया।
राहुल… फेल हो गया।
रिजल्ट देखकर राहुल की आँखें भर आईं। माँ ने उसे चुपचाप गले लगा लिया। राहुल ने उस दिन पहली बार खुद से वादा किया –
“अब मैं समय की कद्र करूँगा। कभी भी आलस या लापरवाही से अपना वक्त बर्बाद नहीं करूँगा।”
अगले साल से राहुल ने पूरी लगन से पढ़ाई शुरू की। उसने एक टाइम टेबल बनाया और पढ़ाई के साथ-साथ खेलने के लिए भी समय निकाला। धीरे-धीरे उसके अंदर अनुशासन आने लगा।
साल के अंत में जब परीक्षा हुई, तो राहुल ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। इस बार वह टॉप पाँच छात्रों में शामिल हुआ। उसे उसकी मेहनत और समय के सदुपयोग का फल मिल चुका था।












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