मेरा प्रश्न
यह कविता एक ऐसे मुसाफ़िर की कहानी है जो शोर, भीड़ और प्रश्नों से जूझते हुए अंततः खुद को मौन में खोज निकालता है। आत्ममंथन की यह यात्रा दिल को छू जाएगी।
“शोर में घिरा, मौन को तरसा,
भीड़ में खोया, खुद को तरसा।
कभी था मैं उड़ता बादल,
आज धूल में गिरा मुसाफिर।
आइना देखा, प्रश्न उठे,
कौन हूँ मैं? कहाँ हूँ मैं?
उत्तर मिले, धुंधले पड़े,
पर मन में फिर भी हलचल बढ़े।
समय की स्याही से लिखा गया,
मेरा ही कोई अधूरा पत्र।
पढ़ता हूँ उसे हर दिन-रात,
शब्द नहीं, बस प्रश्न ही प्रश्न।
और अंततः मौन में पाया,
सागर गहरा, लेकिन शांत।
खुद को भीतर टटोल कर देखा,
स्वयं ही था मेरा संपूर्ण संसार।”












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