सर्दियों की सबसे बढ़िया मिठाई
सर्दियों की ठिठुरन भरी रात में तेनालीराम ने महाराज को ऐसी मिठाई खिलाई, जिसका स्वाद उन्होंने पहले कभी नहीं चखा था। जानिए, क्यों गुड़ कहलाया सर्दियों की सबसे बढ़िया मिठाई।
एक दिन महाराज, राजपुरोहित और तेनालीराम राज उद्यान में टहल रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी और हर ओर सर्दियों की झनक थी। एकाएक महाराज बोले – “अरे, ऐसी कड़ाके की ठंड में तो मन करता है खूब खाओ-पीओ और तन-मन को गर्म बनाए रखो। मिठाई खाने का तो इस मौसम में अलग ही मज़ा है!”
खाने-पीने का ज़िक्र आते ही राजपुरोहित जी के मुँह में पानी आ गया। वह बोले – “और महाराज, सर्दी के मौसम में अगर मावे की मिठाई मिल जाए तो बस! आनंद ही आ जाए।”
मिठाई की बात निकलते ही महाराज को एक प्रश्न सूझा। उन्होंने राजपुरोहित और तेनालीराम से पूछा – “अच्छा आप दोनों मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। बताइए, सर्दियों की सबसे बढ़िया मिठाई कौन-सी है?”
राजपुरोहित जी ने तुरंत उत्तर दिया – “महाराज, एक कैसे बताऊँ? काजू-पिस्ते की बर्फी, हलवा, रसगुल्ला…सबका अपना स्वाद है। सर्दी में तो हर मिठाई अच्छी लगती है!”
महाराज ने मुस्कुराते हुए तेनालीराम की ओर देखा और कहा – “और तुम क्या कहते हो तेनालीराम?”
तेनालीराम बोले – “एक मिठाई है महाराज, जिसे इस मौसम में खाने का अलग ही मज़ा है। वह मेरी पसंदीदा भी है।”
“अच्छा! फिर तो हम उस मिठाई का स्वाद ज़रूर लेना चाहेंगे।”
“बेशक महाराज, आप वह मिठाई चख सकते हैं, लेकिन उसके लिए आज रात आपको मेरे साथ चलना होगा।”
“ठीक है, लेकिन चलना कहाँ है?” – महाराज ने उत्सुकता से पूछा।
“महाराज, मेरी पसंद की वह मिठाई यहाँ शहर में नहीं मिलती, इसलिए थोड़ी दूर चलना पड़ेगा।” – तेनालीराम ने रहस्यमय मुस्कान के साथ कहा।
महाराज ने हामी भरी – “ठीक है, आज रात हम तुम्हारे साथ चलेंगे।”
रात होते ही महाराज ने साधारण व्यक्ति का वेश धारण किया और तीनों— महाराज, पुरोहित और तेनालीराम—यात्रा पर निकल पड़े। काफी देर चलते-चलते वे एक खेत में पहुँच गए। थोड़ी देर बाद महाराज बोले – “तेनालीराम, आज तो तुमने हमें बिलकुल थका ही दिया। तुम्हारी मनपसंद मिठाई खाने के लिए हमें अभी और कितना चलना पड़ेगा?”
“बस महाराज, आगे जहाँ वे लोग बैठे हाथ सेक रहे हैं, बस वहीं तक चलना है।”
थोड़ी ही देर में तीनों वहाँ पहुँच गए। तेनालीराम ने महाराज और पुरोहित को वहीं रुकने को कहा और खुद थोड़ी ही दूरी पर स्थित एक कोल्हू की ओर चल पड़े। वहाँ गन्नों की पिराई हो रही थी और बड़े-बड़े कड़ाहों में गन्ने का रस पककर ताज़ा गुड़ बन रहा था। तेनालीराम ने वहाँ से तीन पत्तलों में गरमागरम गुड़ लिया और वापस लौट आए।
फिर उन्होंने एक-एक पत्तल महाराज और राजपुरोहित जी को थमाई। महाराज ने ज्यों ही गुड़ का एक टुकड़ा मुँह में रखा, उनकी आँखें चमक उठीं – “वाह तेनालीराम! क्या स्वाद है! इसे खाते ही हमारी तो सारी थकान उतर गई।”
अब महाराज ने राजपुरोहित से पूछा – “क्यों पुरोहित जी, आपको कैसी लगी मिठाई?”
राजपुरोहित जी बोले – “सच कहूँ महाराज, यह मिठाई तो वाकई लाजवाब है।”
तेनालीराम मिठाई की तारीफ़ सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। इसी बीच महाराज ने उत्सुक होकर तेनालीराम से पूछा – “अच्छा तेनाली, यह तो बताओ कि यह कौन-सी मिठाई है?”
तेनालीराम ने हँसते हुए कहा – “महाराज, यह कोई महँगी मिठाई नहीं है…अभी-अभी बनकर तैयार हुआ ताज़ा गुड़ है। सर्दियों में इससे बढ़कर स्वादिष्ट और सेहतमंद मिठाई कोई और नहीं है, महाराज।”
महाराज और राजपुरोहित, दोनों आश्चर्यचकित होकर बोले – “क्या! यह गुड़ है?”
“जी महाराज!” – तेनालीराम ने उत्तर दिया।
यह सुनकर महाराज मुस्कुराने लगे। उन्होंने तेनालीराम की पीठ थपथपाई और कहा – “गुड़ इतना मीठा और स्वादिष्ट हो सकता है, इस बात का तो हमें पता ही नहीं था। सच तेनालीराम, तुमने आज हमें सर्दियों की सबसे अच्छी मिठाई खिलाई है।”
अपनी तारीफ़ सुनकर तेनालीराम मुस्कुराए। उन्होंने राजा को प्रणाम किया और फिर वे तीनों वापस लौट गए।












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