बकरी का वजन: बीरबल की अनोखी बुद्धिमानी की कहानी

‘बकरी का वजन’ एक रोचक अकबर-बीरबल की कहानी है जिसमें बादशाह अकबर, बीरबल की बुद्धिमानी की परीक्षा लेते हैं। बीरबल को एक ऐसी बकरी दी जाती है जिसका वजन न तो घटना चाहिए और न बढ़ना। इस असंभव लगने वाली शर्त को बीरबल अपनी चतुराई से कैसे पूरी करते हैं, यही इस कहानी का सार है।

बादशाह अकबर को अक्सर बीरबल की योग्यता की परीक्षा लेने का शौक चढ़ा रहता था। कभी कोई अजीब सवाल पूछ लेते तो कभी उलझन भरी शर्त सामने रख देते। बीरबल भी बादशाह की इन आदतों से भली-भांति परिचित थे, इसलिए वे हमेशा सजग रहते थे— ना जाने कब क्या सवाल दाग दिया जाए।

ऐसे ही एक दिन अकबर ने बीरबल को दरबार में बुलाया और एक बकरी उनके हवाले करते हुए बोले– “बीरबल, इस बकरी का वजन 60 किलो है। इसे तुम अपने साथ ले जाओ। तुम्हारा काम यह है कि एक महीने तक तुम्हें इसकी अच्छी तरह से देखभाल करनी है। इसके खान-पान में कोई कमी न रहने पाए। साथ ही तुम्हें इस बात का भी ध्यान रखना है कि बकरी का वजन इस एक महीने में न तो घटे और न ही बढ़े।”

बीरबल बादशाह की यह अटपटी शर्त सुनकर परेशान हो गए, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे। बादशाह का आदेश था इसलिए वे बकरी को लेकर अपने घर चले गए।

घर पहुँचते ही बकरी आँगन में खड़े पेड़ के नीचे उगी हरी-भरी घास देखकर उछल पड़ी। वह दौड़कर गई और उस घास को चरने लगी। बीरबल हड़बड़ाकर उसके पीछे भागे मगर बकरी बहुत चंचल थी। वह कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ, झट से भाग निकलती— बीरबल भी उसके पीछे-पीछे भागते रहे। दोनों के मध्य यह भाग-दौड़ कुछ देर तक चली।

इतने में शोर सुनकर बीरबल की पत्नी आँगन में आ गई। उन्होंने देखा कि उनके पति एक बकरी के पीछे हाँफते-हाँफते भाग रहे हैं।

वे हँसी दबाते हुए बोलीं– “अरे, ये बकरी कहाँ से लाई है? और आप इस तरह इसके पीछे क्यों भाग रहे हैं?”

बीरबल रुककर पसीना पोंछते हुए बोले– “जहाँपनाह की दी हुई है। उनका फरमान है कि एक महीने तक इसे खूब खिलाना-पिलाना है, लेकिन इसका वजन न तो घटना चाहिए और न ही बढ़ना चाहिए। अब सोचो, इसे पूरा खाना भी देना है और वजन भी एक जैसा रखना है— ये कैसे संभव हो सकेगा? ऊपर से ये बकरी दौड़ा-दौड़ाकर मुझे ही थका रही है। कहीं इसके बदले मेरा ही वजन न घट जाए।”

यह सुनकर बीरबल की पत्नी ठहाका मारकर हँस पड़ी और बोली– “अरे आप चिंता मत कीजिए। अगर भाग-दौड़ में आपका वजन कम हो भी गया तो रसोई में जाकर अच्छा-खासा खाना खा लीजिएगा— सब फिर से बराबर हो जाएगा।”

पत्नी की यह बात सुनते ही बीरबल की आँखों में चमक आ गई। वह उत्साह से बोले– “वाह भाग्यवान! तुमने तो मुझे इस उलझन का हल ही बता दिया।”

उस दिन से बीरबल बकरी को दिन में भरपेट घास-चारा खिलाते, लेकिन रात को थोड़ी देर के लिए उसके सामने एक कुत्ता छोड़ देते। बकरी को देखते ही कुत्ता उसके पीछे भागता और कुत्ते से अपनी जान बचाते हुए बकरी भी भागती।

अब बीरबल नित्य ऐसे करने लगे। देखते ही देखते एक महीना पूरा हो गया। महीना पूरा होते ही बीरबल बकरी को लेकर दरबार पहुँचे। दरबार में जब बादशाह ने बकरी का वजन करवाया तो वे यह देखकर दंग रह गए कि बकरी का वजन 60 किलो ही था— न तो उसका वजन पहले से कम हुआ था और न ही बढ़ पाया था।

अकबर ने आश्चर्यचकित होकर बीरबल से पूछा– “बीरबल, बकरी का वजन उतना ही क्यों है? आखिर यह क्या चमत्कार है?”

बीरबल ने मुस्कराकर उत्तर दिया– “कोई चमत्कार नहीं है जहाँपनाह। मैं दिन भर बकरी को पेट भर खाना देता था और रात होते ही इसके पीछे कुत्ता दौड़ा देता था। अपनी जान का ख्याल करते हुए यह बकरी कुत्ते से दूर-दूर भागती…और मैं इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि कुत्ता बकरी को कोई नुकसान न पहुँचा पाए। रोजाना करीब एक घंटा बकरी ऐसे ही भागती थी जिस कारण उसका वजन समान बना रहा।”

बीरबल का जवाब सुनकर दरबार ठहाकों से गूँज उठा। अकबर भी हँस पड़े। बीरबल की तारीफ करते हुए वे बोले– “वाह बीरबल, सचमुच तुम्हारी बुद्धि का कोई जवाब नहीं।”

इस तरह एक बार फिर बीरबल ने अपनी चतुराई और बुद्धिमानी का परिचय देते हुए बादशाह अकबर का दिल जीत लिया।

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