राखी का तोहफा
रक्षाबंधन के दिन मायूस बैठी आयुषी को तब सबसे बड़ा तोहफा मिला जब उसका भाई आरव अचानक उसके दरवाजे पर खड़ा था। सिर्फ राखी नहीं, बल्कि अबकी बार वो अपने देश लौट आया था — हमेशा के लिए। यह कहानी भाई-बहन के रिश्ते की गहराई और उस बंधन की मिठास को बयां करती है।
आयुषी की शादी को छह साल हो चुके थे। वह मेरठ में अपने पति आनंद और अपनी चार साल की बच्ची अवनि के साथ रहती थी।
कल रक्षाबंधन है और आयुशी अपने कमरे में मायूस बैठी है। हर साल इस दिन घर में रौनक हुआ करती है। हंसी-ठिठोली, मिठाइयों की खुशबू…लेकिन इस बार घर में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी।
आयुषी का छोटा भाई आरव ऑस्ट्रेलिया में एक टेक कंपनी में नौकरी करता है। नौकरी को दो साल हो चुके थे और आरव पिछले दो साल से रक्षाबंधन मनाने घर नहीं आया था। आयुषी ने दोनों बार अपने भाई को राखी कुरियर की थी।
इस बार भी जब माँ ने पूछा कि राखी भेज दी है या नहीं, तब उसने माँ से झूठ कह दिया कि उसने राखी भेज दी है…लेकिन असलियत में अब तक उसने राखी खरीदी ही नहीं थी।
रक्षाबंधन की सुबह वह जल्दी उठ गई। वैसे तो आज का दिन हर एक बहन के लिए खास होता है…लेकिन आयुषी के चेहरे आज को लेकर कोई उत्साह नहीं था।
“अगर इस बार भी नहीं आ सकता था तो फोन करके कह तो देता। न ही फोन किया और न ही मैसेज और जब मैंने फोन किया तो उठाया नहीं। माँ-पापा को भी फोन नहीं किया। विदेश जाकर तो वो हम सबको जैसे भूल ही गया है।”
आयुषी के मन में अपने भाई के प्रति इस तरह के कई विचार चल रहे थे…तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी। वह धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ी। दरवाजा खोलते ही देखा कि सामने उसका भाई आरव खड़ा था- हाथ में एक छोटा सा डिब्बा लिए…
“रक्षाबंधन मुबारक हो, दीदी!” – आरव के इतना कहते ही आयुषी ने उसे कसकर गले लगा लिया। मुँह से कोई शब्द नहीं निकला, सिर्फ आँखों से आँसू बह रहे थे। और बहें भी क्यों न, इतने समय बाद उसका भाई उससे मिलने आया था। आयुषी ने तुरंत अपनी माँ को वीडियो कॉल किया।
माँ ने वीडियो काॅल में आरव को देखकर सवाल किया- “अरे आरव, बेटा तू ठीक तो है न? वापस कब आया? इतने फोन किए तुझे, लेकिन तूने एक का भी जवाब नहीं दिया। अपने परिवार वालों की याद नहीं आती क्या तुझे…”
“नहीं माँ, ऐसी कोई बात नहीं है। याद तो आप सबकी बहुत आती है। फोन मैंने इसलिए नहीं किया क्योंकि मैं आप सबको सरप्राइज देना चाहता था। आज रक्षाबंधन है न, तो दीदी से मिलना ज्यादा जरूरी था। इसलिए पहले यहाँ आ गया। कल आपसे मिलने आता हूँ।”
“ठीक है। कल तू आ जा, फिर बात करेंगे। अभी तुम दोनों भाई-बहन बातें करो और राखी का त्योहार मनाओ”- इतना कहकर माँ फोन रख देती हैं।
फिर दोनों भाई-बहन बातों में लग जाते हैं। बातों-बातों में शाम हो जाती है। आयुषी का पति भी मिठाइयाँ लेकर घर आ जाता है। अब राखी बाँधने का समय होता है, लेकिन आयुषी ने तो राखी खरीदी ही नहीं थी।
वह तुरंत अपने पति आनंद को राखी लेकर आने के लिए कहती है…लेकिन आरव उन्हें जाने से रोक लेता है। फिर आरव वह डिब्बा अपनी दीदी के हाथ में रखता है जो वह अपने साथ लेकर आया था। आयुषी उस डिब्बे को खोलती है तो उसमें दो राखियाँ निकलती हैं। वह इन्हें तुरंत पहचान जाती है।
“दीदी, ये वही राखियाँ हैं जो पिछले दो साल में तुमने मुझे कुरियर की थीं। मैंने इन्हें संभाल कर रखा है क्योंकि इनमें तुम्हारा प्यार और आशीर्वाद दोनों हैं। वहाँ विदेश में जब भी तुम्हारी याद आती थी, बस इन्हें देख लेता था।”
आरव की यह बात सुनकर आयुषी भावुक हो जाती है। वह जान चुकी थी कि उसका छोटा भाई उससे कितना प्यार करता है। अब आयुषी उन्हीं दोनों राखियों में से एक राखी आरव की कलाई पर बाँध देती है। फिर दोनों एक-दूसरे को मिठाई खिलाते हैं। आयुषी की बेटी अवनि भी बची हुई एक राखी अपने मामा की कलाई पर बाँध देती है।
उधर आनंद, इन सारे यादगार पलों को अपने कैमरे में कैद कर रहा होता है। अब भाई के गिफ्ट देने की बारी थी। आरव सबसे पहले नन्हीं अवनि को गिफ्ट दे देता है- ढेर सारे खिलौने, मिठाई और पैसे।
अब बारी थी आयुषी की…आरव अपने बैग से एक लिफाफा निकालकर आयुषी को देता है। लिफाफा देख आयुषी हैरान होकर पूछती है – “आरव ये क्या? अपनी भांजी के लिए इतना सबकुछ…और अपनी बड़ी बहन के लिए केवल ये लिफाफा!”
“अरे दीदी, आप इसे खोलकर तो देखिए…”
आयुषी लिफाफा खोलकर देखती है। उसमें एक पत्र होता है। जब वह उस पत्र को पढ़ती है तो वह चौंक जाती है।
“आरव, क्या ये सच है?” – आयुशी अचंभित होकर पूछती है।
“हाँ दीदी, मैं पिछले एक साल से भारत में नौकरी पाने के लिए कोशिश कर रहा था, और चार दिन पहले ही मुझे ये पत्र मिला। मुझे दिल्ली में एक टेक कंपनी में नौकरी मिल गई है। ये उसी कंपनी का जॉइनिंग लेटर है। अब कभी तुम्हें राखी कुरियर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि अब मैं यहीं रहकर काम करूँगा और हर रक्षाबंधन तुमसे राखी बंधवाने आया करुँगा। बस यही है तुम्हरे लिए, मेरी ओर से इस साल का ‘राखी का तोहफा’।”
आरव की ये सारी बातें सुनकर आयुषी का दिल भर आता है। वह तुरंत अपने भाई को गले लगा लेती है। आज आयुषी बहुत खुश थी…उसे अपने भाई से अब तक का सबसे कीमती तोहफा जो मिला था।
वाकई, भाई-बहन का ये प्यार जग में सबसे निराला है।












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