लालच बुरी बला: एक प्रेरणादायक कहानी
“लालच बुरी बला” एक प्रेरणादायक हिंदी कहानी है, जो मनोज नामक युवक के अनुभवों के माध्यम से यह सिखाती है कि लालच में लिया गया निर्णय किस प्रकार हमें हानि पहुँचा सकता है। यह कहानी व्यापार, विश्वास और धैर्य की असली ताकत को उजागर करती है।
कुछ समय पूर्व ही मनोज ने शहर में भोजन की अपनी एक छोटी-सी दुकान खोली थी। यहाँ वह 40 रुपये प्रति प्लेट के हिसाब से लोगों को सब्जी-पूरी खिलाता था- 40 रुपये में 10 गरमागरम पूरी और मसालेदार आलू की सब्जी।
लोगों को सस्ते में अच्छा खाना मिल रहा था, इसलिए बहुत शीघ्र मनोज की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ होने लगी। इस प्रकार मनोज की दुकान ठीक-ठाक चल रही थी।
फिर एक दिन उसकी दुकान पर एक व्यक्ति भोजन करने आया। भोजन करने के पश्चात उसे स्वाद बहुत अच्छा लगा इसलिए उसने मनोज से कहा- “अरे भाई, खाना तो बहुत बढ़िया है। इतनी कम कीमत में इतना जबरदस्त खाना तो पूरे शहर में नहीं मिलता होगा। वैसे एक बात बताओ…तुम दाम क्यों नहीं बढ़ाते?”
मनोज मुस्कराते हुए बोला- “साहब दाम कम हैं, इसलिए सभी लोग स्वाद लेकर भोजन करते हैं। मुनाफा भी ठीक-ठाक हो जाता है, तो ऐसे में भला दाम क्यों ही बढ़ाऊँ?”
मनोज की बात सुनकर वह व्यक्ति बोला- “अरे नहीं भाई, ऐसा सोचोगे तो जिंदगीभर यही छोटी-सी दुकान चलाते रह जाओगे। थोड़ा बड़ा सोचो, तभी तुम तरक्की कर पाओगे। यदि आगे बढ़ना है तो दाम बढ़ाओ।”
इतना कहकर, पैसे देकर वह व्यक्ति चला गया। व्यक्ति तो चला गया था, परंतु उसकी बात अब मनोज के मन में घर कर गई थी। वह कई दिन तक इसी विषय में सोचता रहा। अंततः उसने दाम बढ़ाने का निर्णय लिया। अगली सुबह उसने रेट 40 से बढ़ाकर 50 रुपये कर दिए।
बढ़े हुए दाम देखकर जब लोगों ने शिकायत की, तो मनोज बोला- “देखिए भाई साहब, महँगाई का जमाना है। घर में मैं अकेला कमाने वाला हूँ, और फिर मुझे अपनी और अपने परिवार की जेबखर्ची भी तो चलानी है। ऐसे में यदि दाम न बढ़ाऊँ तो क्या करूँ, बताइए।”
रोज के ग्राहक मनोज की बात को समझते हैं और उसके यहाँ खाना बंद नहीं करते। नए ग्राहक भी धीरे-धीरे आते रहते हैं और दाम बढ़ने की वजह से मनोज का मुनाफा भी अब पहले से अधिक हो रहा था।
कुछ दिन बाद वह व्यक्ति पुनः आया। खाना खाने के पश्चात वह बोला- “तो बढ़ा दिए दाम?”
मनोज ने मुस्कराकर उत्तर दिया- “हाँ, अब 40 से बढ़ाकर 50 रुपये कर दिए हैं।”
यह सुन वह व्यक्ति आश्चर्य के साथ बोला- “क्या! केवल 50 रुपये? अरे भाई, 10 रुपये बढ़ाने से क्या होगा? बाकी जगहों पर ऐसा खाना 100 से ऊपर में मिलता है। तुम कम से कम 80 तो करो।”
“परंतु ऐसे अचानक दाम इतना बढ़ा दिया तो लोग आएँगे ही नहीं।”
“नहीं, ऐसा नहीं होगा। तुम अचानक नहीं, कुछ दिन बाद दाम बढ़ाना। जब लोग शिकायत करने लगें तो कह देना कि आर्थिक तंगी के चलते तुम्हें इस वक्त पैसों की सख्त जरूरत है…इसलिए फिलहाल दाम बढ़ा दिए हैं। लोग तुम्हारी मजबूरी समझेंगे और तुम्हारे यहाँ खाना बंद नहीं करेंगे। फिर धीरे-धीरे उन्हें 80 रुपये प्लेट की आदत हो जाएगी।”
मनोज को उसकी बात उचित लगी। दाम 50 रुपये करने से मुनाफा बढ़ गया था। 80 रुपये करने पर तो मुनाफा और भी अधिक होगा- यह सोचकर मनोज हर्षित हो रहा था। अब लालच ने उसके मन और मस्तिष्क पर नियंत्रण कर लिया था।
कुछ दिनों बाद उसने दाम बढ़ाकर 80 रुपये प्लेट कर दिए। यह देखकर उसके रोज के ग्राहक बहुत नाराज हुए- “अरे! अभी कुछ दिन पहले ही तो 40 से 50 किया था, अब सीधे 80? ये क्या मजाक है?”
मनोज ने बहाना बनाकर लोगों को समझाया और जो नहीं माने, उनसे कहने लगा- “देखो भाई, यही खाना बड़ी दुकानों में 100 से 150 रुपये तक मिलता है। आप लोगों को खाना है तो खाइए, वरना और कहीं चले जाइए।”
मनोज का यह व्यवहार देखकर उसके कुछ नियमित ग्राहक क्रोधित होकर वहाँ से चले गए। हालाँकि कुछ ग्राहक 80 रुपये में भी खाना खा रहे थे…आखिर वैसा स्वाद कहीं और मिलता ही नहीं था।
ऐसे ही कुछ दिन बीते। अब मनोज की दुकान पर नए ग्राहक आते ही नहीं थे। जो आता था, वह दाम सुनकर ही लौट जाता था। जो एक-दो नियमित ग्राहक आ रहे थे, उन्होंने भी धीरे-धीरे आना कम कर दिया। ज्यादा मुनाफे के चक्कर में मनोज का जो लाभ हो रहा था, अब वह भी नहीं हो पा रहा था।
फिर एक दिन वह व्यक्ति दुबारा दुकान पर आ पहुँचा जिसने मनोज को दाम बढ़ाने की सलाह दी थी। दुकान में अधिक ग्राहकी न देखकर वह कहने लगा- “क्या हुआ भाई! आज दुकान में कुछ खास रौनक नहीं है?”
यह सुनकर मनोज की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। वह बोला- “तुम्हारी सलाह मानकर मैंने अपने भरोसेमंद ग्राहकों को खो दिया है। तुमने कहा था दाम बढ़ाओ, तो मुनाफा बढ़ेगा…लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टा जो थोड़ा-बहुत मुनाफा हो रहा था, अब वह भी नहीं हो रहा।”
“चिंता मत करो। कुछ दिन ऐसा होगा, फिर धीरे-धीरे लोग आदत डाल लेंगे। थोड़ा सब्र रखो।”
यह सुनते ही मनोज का क्रोध उस व्यक्ति पर फूट पड़ा- “बस, बहुत हो गया! नहीं सुननी अब तुम्हारी कोई बात…आज के बाद मेरी दुकान पर कभी मत आना। चले जाओ यहाँ से!”
मनोज का क्रोध देखकर वह व्यक्ति सकपका गया और बिना कुछ कहे ही लौट गया।
कुछ दिन और बीते। आज तो दुकान पर एक भी ग्राहक नहीं आया- न नया, न पुराना। सुबह से शाम तक पूरी कढ़ाई वैसी की वैसी ही रखी रही। निराश मनोज दुकान बंद करके चुपचाप घर चला गया। आज एक भी प्लेट नहीं बिकी- इस बात को लेकर वह बहुत दुखी और चिंतित था। तभी गाँव से पिताजी का फोन आया। जब उन्होंने दुकान के बारे में पूछा तो मनोज ने बिना छिपाए सारी बात अपने पिता से कह दी।
पिताजी ने लंबी साँस ली और बोले- “बेटा, ये जो लालच होता है न, यह आदमी को बहुत नीचे गिरा देता है। तूने भी जल्दी पैसा कमाने का लालच किया और नुकसान कर बैठा। कोई एक दिन में अमीर नहीं बनता बेटा। थोड़ा-थोड़ा करके ही इंसान आगे बढ़ता है।”
मनोज ने कहा- “पापा, मैं तो चाहता हूँ कि अपना धंधा बड़ा करके एक बड़ी दुकान खोलूँ, मगर बिना पैसे के यह होगा नहीं…इसलिए दाम तो बढ़ाने ही पड़ेंगे न?”
पिता बोले- “तेरी बात सही है, लेकिन एक दिन में कोई करोड़पति नहीं बन जाता, समय लगता है बेटा। तू अभी दाम 50 रुपये प्रति प्लेट ही रख। यह दाम पहले के दाम से 10 रुपये ज्यादा भी है और अभी के दाम से कम भी। थोड़े समय में फिर से ग्राहक तेरे पास आने लगेंगे और तेरा मुनाफा भी धीरे-धीरे बढ़ने लगेगा।”
मनोज अपने पिताजी की बात मान लेता है और अगले दिन से दाम 50 रुपये प्रति प्लेट कर देता है। उस दिन ज्यादा लोग नहीं आते। नियमित ग्राहकों में से भी केवल एक ही ग्राहक आया था, लेकिन वह कम दाम देखकर बहुत खुश था। वह मनोज से कहता है- “वाह मनोज भैया, अब सही दाम रखा है आपने…लेकिन एक बात बताओ, फिर से दाम बढ़ा तो नहीं दोगे न?”
मनोज हँसते हुए कहता है- “अरे नहीं नहीं, अब दाम यहीं रहेगा…आप चिंता मत कीजिए।”
इसके बाद धीरे-धीरे मनोज के पुराने ग्राहक लौटने लगे थे। नए ग्राहक भी अच्छी संख्या में आने लगते हैं…और अब उसका मुनाफा भी अच्छा-खासा होने लगता है।
इसलिये मनोज बहुत खुश था। साथ ही उसे अपनी गलती का एहसास भी हो चुका था। वह समझ गया था कि लालच करना कितना नुकसानदायक होता है- लालच में आकर किया गया कार्य कभी लाभ नहीं देता।
कहानी से मिली सीख:
- लालच में किया गया निर्णय अक्सर नुकसान पहुँचाता है।
- व्यवसाय में ग्राहक का भरोसा सबसे बड़ी पूँजी होता है।
- धीरे-धीरे, धैर्य के साथ बढ़ने में ही स्थायी सफलता छिपी होती है।
- हर सलाह सही नहीं होती – सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।
- कमाई जरूरी है, लेकिन ईमानदारी और संतुलन के साथ।












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