निरंतर अभ्यास – सफलता की कुंजी

यह प्रेरणादायक हिंदी कहानी अनिल और शिवम की दौड़ पर आधारित है। यह सिखाती है कि जीत का असली राज निरंतर अभ्यास और मेहनत में छुपा है।

अनिल के स्कूल में हर तीन महीने पर खेल-कूद का बड़ा आयोजन होता था। यह स्कूल की परंपरा थी, ताकि बच्चों में पढ़ाई के साथ-साथ खेलों के प्रति भी जागरूकता बनी रहे। इस बार भी जब स्पोर्ट्स प्रतियोगिता का ऐलान हुआ तो बच्चों में उत्साह की लहर दौड़ गई।

इस प्रतियोगिता में दौड़ का मुकाबला भी होना था और बच्चों को एक महीने पहले ही घोषणा करके इसकी सूचना दे दी गई थी ताकि वे अभ्यास कर सकें। मैदान पर रोज सुबह कई बच्चे दौड़ने का अभ्यास करने लगे। उनमें अनिल भी शामिल था- वह भी इस दौड़ में हिस्सा लेने वाला था।

प्रतियोगिता का दिन भी आ गया। सभी बच्चे सफेद ड्रेस और जूते पहनकर मैदान पर खड़े थे। सीटी बजते ही दौड़ शुरू हो गई। जैसे ही अंतिम लाइन पार हुई और परिणाम आए तो पता चला कि अनिल सबको पछाड़कर पहले नंबर पर आया है। उसके ठीक पीछे शिवम आया जो कि सिर्फ दो सेकंड के फासले से द्वितीय आया था।

अनिल प्रथम आने की खुशी से फूला नहीं समा रहा था। वह अपने दोस्तों के बीच इतराते हुए बोला- “देखा, मैं ही हूँ असली चैम्पियन! तुममें से कोई भी मेरे पास तक नहीं आ सका।”

तभी शिवम हाँफता हुआ उसके पास आया और मुस्कुराकर बोला- “ज्यादा हवा में मत उड़ो अनिल! मेरे और तुम्हारे बीच केवल दो सेकंड का ही फासला था। अगली बार मैं ये फासला भी पूरा कर लूँगा।”

अनिल हँसते हुए बोला- “अरे भाई, रहने दो। तुम मुझे सपने में भी नहीं हरा सकते, हकीकत में तो बहुत दूर की बात है।”

“अब वो तो समय ही बताएगा कि आखिर कौन बाजी मारता है।”- इतना कहकर शिवम वहाँ से चला गया।

अनिल का ऐसा रवैया देखकर उसका एक दोस्त उससे कहने लगा- “यार अनिल, इतना घमंड अच्छा नहीं है। माना कि इस बार तू जीत गया है लेकिन हो सकता है शिवम सचमुच अगली बार तुझसे आगे निकल जाए।”

यह सुनते ही अनिल भड़क गया- “अच्छा, तो अब तू भी उसी की भाषा बोल रहा है? जा, आज के बाद कभी मुझसे बात मत करना। और हाँ, एक बात याद रखना- अगली बार भी जीत मेरी ही होगी।”

घमंड से जवाब देकर अनिल वहाँ से चला गया। कुछ समय यूँ ही बीत गया। अनिल ने अब तक दौड़ की तैयारी शुरू नहीं की थी। दरअसल बात ये थी कि अनिल अपनी जीत की खुशी में इतना डूब गया था कि उसने अभ्यास करना ही छोड़ दिया। दूसरी तरफ शिवम रोजाना सुबह मैदान में एक घंटा दौड़ता, पसीना बहाता और खुद को बेहतर बनाने के प्रयास करता…

अनिल के दोस्त लगातार उसे अभ्यास करने को कहते रहते लेकिन वो किसी की नहीं मानता था। धीरे-धीरे समय गुजरता गया और तीन महीने बाद फिर से दौड़ प्रतियोगिता का दिन आया। मैदान में वही उत्साह और वही शोर था। सीटी बजते ही सभी प्रतिभागी दौड़ पड़े।

इस बार नजारा कुछ अलग था। अनिल आधे रास्ते में ही थककर हाँफने लगा। उसके पैर भारी पड़ रहे थे और सांसें तेज हो रही थीं- वहीं शिवम लगातार तेजी से दौड़ता गया और आखिरकार उसने सबसे पहले फिनिश लाइन पार कर ली।

वही अनिल जो पिछली बार का विजेता था, आज बीस बच्चों की दौड़ में पीछे से पाँचवें नंबर पर आया। मैदान में तालियाँ शिवम के लिए बज रही थीं और अनिल का सिर शर्म से झुक गया था। वह एक कोने में जाकर अकेला बैठ गया।

तभी शिवम उसके पास आया। उसने अनिल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “दोस्त, निराश मत हो। पिछली बार तुम जीते थे, इस बार मैं जीत गया। खेल में तो ये होता रहता है। तुमने जीत के नशे में आकर अभ्यास से मुँह मोड़ लिया और उसका परिणाम तुम देख ही रहे हो…खैर मैं चाहता हूँ कि अगली बार तुम ही जीतों लेकिन उसके लिए तुम्हें जमकर अभ्यास करना पड़ेगा।”

अनिल की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीमे स्वर में कहा- “शिवम, तुम सही कहते हो, गलती मेरी ही है। मुझे लगा था कि मैं बिना अभ्यास किए ही जीत जाऊँगा, लेकिन अब मुझे समझ आ गया है कि निरंतर अभ्यास करने पर ही व्यक्ति सफल हो पाता है।”

उस दिन से ही अनिल ने ठान लिया कि अब वह खूब अभ्यास करेगा। वह रोज सुबह सूरज निकलने से पहले ही मैदान में पहुँच जाता और जी-जान लगाकर दौड़ने का अभ्यास करता…तीन महीने बाद जब अगली दौड़ हुई तो अनिल इस बार द्वितीय आया। शिवम अभी भी प्रथम ही था, लेकिन मैदान में तालियाँ इस बार अनिल के लिए थीं।

अनिल ने दूसरा स्थान पाकर भी चैन की सांस ली। उसने मुस्कुराकर शिवम से हाथ मिलाया और बोला- “धन्यवाद दोस्त, तुम्हारी वजह से मुझे इतना बड़ा सबक मिला। अब मैं अभ्यास करना कभी नहीं छोड़ूँगा।”

अनिल की बात सुनते ही शिवम ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।

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