कुआं और पानी : बीरबल की बुद्धिमानी की अनोखी कहानी
“कुआं और पानी” एक प्रेरणादायक कहानी है जिसमें बीरबल अपनी बुद्धिमानी से एक गरीब किसान को न्याय दिलाते हैं और एक बेईमान व्यक्ति को उसकी गलती का एहसास कराते हैं।
एक गाँव में एक मेहनती किसान रहता था। उसकी सबसे बड़ी चिंता थी कि अपने खेतों को सींचने के लिए पानी कहाँ से लाया जाए। वह अपने खेत के आस-पास किसी कुएँ की तलाश में था ताकि उसके खेतों में पानी की आपूर्ति हो सके।
तलाश करते-करते एक दिन उसे एक पुराना कुआँ दिखाई दिया। यह कुआँ उसके खेत से ज़्यादा दूर भी नहीं था। किसान की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने मन ही मन सोचा – “अब तो मेरे खेत हरे-भरे हो जाएंगे, यह कुआँ मेरी सारी परेशानी खत्म कर देगा।”
अगले दिन वह बाल्टी लेकर कुएँ पर पहुँचा ताकि सिंचाई के लिए पानी निकाल सके। लेकिन जैसे ही उसने बाल्टी कुएँ में डाली, अचानक एक आदमी वहाँ आ गया। उसने ऊँची आवाज़ में कहा, “यह कुआँ मेरा है! इसलिए इसका पानी तुम नहीं ले सकते। यदि पानी चाहिए तो तुम्हें यह कुआँ ख़रीदना पड़ेगा।”
यह बात सुनकर किसान कुछ देर रुका और फिर मन ही मन सोचने लगा कि अगर यह कुआँ मेरा हो जाए, तो मुझे कभी पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। फिर क्या था, दोनों के बीच एक रकम तय हुई। अब चूँकि किसान के पास पर्याप्त रकम नहीं थी, इसलिए वह उस आदमी को अगले दिन रकम देने का वादा करके घर लौट आया।
घर पहुँचते ही उसने अपने करीबियों और दोस्तों से इस बारे में बात की और कुएँ के लिए तय रकम का इंतज़ाम करने में जुट गया। थोड़ी भागदौड़ और कोशिश के बाद आखिरकार उसने वह रकम जमा कर ली। अब वह पूरी तरह से निश्चिंत हो चुका था क्योंकि उसे कुआँ ख़रीदने से अब कोई नहीं रोक सकता था।
अगले दिन सुबह वह पैसे लेकर सीधे उस आदमी के घर जा पहुँचा। उसने तय रकम कुएँ के मालिक को दी और कुआँ ख़रीद लिया।
अब किसान ने राहत की साँस ली और उत्साहित होकर बाल्टी उठाई ताकि पानी निकाल सके। लेकिन तभी वही आदमी फिर आ पहुँचा और बोला, “रुको! तुम यह पानी नहीं ले सकते। मैंने तुम्हें कुआँ बेचा है, पानी नहीं। पानी अब भी मेरा है!”
यह सुनकर किसान मायूस हो गया और न्याय के लिए सीधा बादशाह अकबर के दरबार में शिकायत करने पहुँच गया।
बादशाह अकबर ने उस किसान की पूरी कहानी सुनी और फिर उस आदमी को दरबार में बुलाया, जिसने वह कुआँ बेचा था। बादशाह का फ़रमान सुनते ही वह आदमी भागा-भागा दरबार में हाज़िर हो गया। फिर बादशाह ने उस आदमी से सवाल किया – “जब तुमने इस किसान को अपना कुआँ बेच दिया है, तो फिर इसे पानी क्यों नहीं लेने दे रहे हो?”
इस पर उस आदमी ने जवाब दिया – “जहाँपनाह! मैंने इसे वह कुआँ बेचा था, पानी नहीं। पानी पर तो अभी भी मेरा हक़ है।”
यह बात सुनकर राजा भी सोच में पड़ गए। उन्होंने कहा, “बात तो तुम पते की कह रहे हो, लेकिन अब इसका उपाय क्या निकाला जाए?” काफी देर सोचने के बाद जब इस समस्या को सुलझाने में अकबर नाकाम हो गए, तो उन्होंने बीरबल को बुलावा भेजा।
कुछ देर बाद बीरबल दरबार में उपस्थित हुए और किसान की समस्या सुनी। सारी बात जानने के बाद बीरबल मुस्कुराते हुए उस आदमी से बोले, “यह बात ठीक है कि तुमने कुआँ बेचा है लेकिन पानी नहीं। लेकिन फिर तुम्हारा पानी किसान के कुएँ में क्या कर रहा है? कुआँ अब तुम्हारा नहीं है, इसलिए फ़ौरन अपने पानी को कुएँ से बाहर निकालो और किसान का कुआँ खाली करो।”
यह सुनते ही उस चालाक आदमी का चेहरा उतर गया। उसे समझ आ गया कि उसकी धूर्तता पकड़ी जा चुकी है। उसने तुरंत राजा से माफ़ी माँगी और माना कि कुएँ के साथ उसके पानी पर भी किसान का पूरा अधिकार है।
इसके बाद राजा अकबर ने बीरबल की बुद्धिमानी की खूब सराहना की और उस आदमी को उसकी बेईमानी के लिए दंडित किया।











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