धरती पर स्वर्ग – तेनालीराम की प्रेरणादायक कहानी

तेनालीराम की बुद्धिमत्ता भरी यह कथा बताती है कि स्वर्ग कोई दूर की जगह नहीं, बल्कि हमारी सुंदर धरती पर ही मौजूद है। प्रकृति का सौंदर्य ही सच्चा स्वर्ग है।

महाराज कृष्णदेव राय अपने बचपन में सुनी कथा अनुसार यह विश्वास करते थे कि इस ब्रह्मांड की सबसे उत्तम और मनमोहक जगह स्वर्ग है। एक दिन दरबार में बैठे-बैठे महाराज को बचपन की वहीं बातें याद आ गईं। अचानक मुस्कुराते हुए उन्होंने अपने दरबारियों से पूछा – “आप सभी मुझे यह बताइए कि यह स्वर्ग आखिर कहाँ है? यदि कोई इस जगह का पता जानता है तो मुझे वहाँ ले चले।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज की यह बात सुनकर सारे दरबारी अपना सिर खुजाने लगे अब भला स्वर्ग जैसी कोई जगह वास्तव में होती भी है या नहीं यह किसी को ज्ञात नहीं था। अपने मंत्रिगण और दरबारियों की खामोशी देखकर महाराज की भौंहें तन गईं। अंततः उन्होंने तेनालीराम से सवाल किया – तेनालीराम, क्या तुम हमें स्वर्ग दिखा सकते हो?”

तेनालीराम ने कुछ देर सोचने के पश्चात उत्तर दिया – “महाराज, मैं आपको स्वर्ग के दर्शन करा सकता हूँ लेकिन उसके लिए मुझे दो महीने का समय और दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ चाहिए।”

महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम को दस हजार सोने के सिक्के और दो माह का समय दे देते हैं और शर्त रखते हैं कि अगर तेनालीराम अपना वादा पूरा न कर सके तो उन्हें कड़ा दंड दिया जाएगा। यह सुनते ही तेनालीराम से ईर्ष्या रखने वाले दरबारियों के चेहरे खिल उठे। उन्हें लग रहा था कि इस बार तेनालीराम गच्चा जरूर खाएँगे।

समय बीता। दो माह पूरे होते ही महाराज ने तेनालीराम को दरबार में बुलवाया और उन्हें अपने वादे की याद दिलाई…जिसके बाद तेनालीराम ने कहा – “महाराज, मैंने स्वर्ग खोज लिया है। हम कल प्रातः ही स्वर्ग देखने के लिए प्रस्थान करेंगे।”

अगली सुबह तेनालीराम, महाराज कृष्णदेव राय और उनके खास मंत्रीगणों को एक सुंदर स्थान पर ले जाते हैं जहाँ खूब हरियाली, चहचहाते पक्षी और वातावरण को शुद्ध करने वाले पेड़-पौधे होते हैं। उस जगह का सौंदर्य देख महाराज कृष्णदेव राय अति प्रसन्न होते हैं। उनके नेत्र प्रकृति के इस मनोरम दृश्य पर से हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

तेनालीराम महाराज को यूँ प्रकृति को निहारता देख मुस्कुराने लगे, लेकिन उन्हें मुस्कुराता देख वहाँ उपस्थित ईर्ष्यालु मंत्रियों को चैन कहाँ आने वाला था। उनमें से एक तुरंत महाराज से बोला – “महाराज, यह स्थान तो बहुत सुंदर है मगर स्वर्ग कहाँ है? तेनालीराम ने तो आपसे स्वर्ग दिखाने का वादा किया था।”

महाराज ने भी सिर हिलाते हुए कहा – “हाँ तेनाली, अब तो बताओ। यह स्वर्ग कहाँ है?”

तेनालीराम मुस्कुराते हुए बोले – “महाराज, जब हमारी पृथ्वी पर ही फल, फूल, पेड़, पौधे, अनंत प्रकार के पशु-पक्षी और ऐसा अद्भुत वातावरण मौजूद है तो फिर स्वर्ग की कामना क्यों करना? जबकि स्वर्ग जैसी कोई जगह है भी इसका कोई प्रमाण नहीं है— यह तो सिर्फ कल्पनाएँ हैं। असली स्वर्ग तो हमारी इस धरती पर ही बसा है। प्रकृति का यह अलौकिक सौंदर्य ही इस धरती का स्वर्ग है महाराज।”

महाराज के होंठों पर मुस्कान फैल गई – “सही कहते हो तेनाली, तुमने मेरी आँखें खोल दीं।”

महाराज तेनालीराम की बातों से प्रभावित हो रहे थे। अब भला ये देखकर ईर्ष्यालु मंत्री कहाँ चुप रहने वाले थे। एक ने तुरंत टोका – “महाराज, पर इन्हें आपने दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ दी थीं। उनका हिसाब भी तो होना चाहिए।”

महाराज ने भी हँसते हुए पूछा – “हाँ तेनाली, उन मुद्राओं का क्या हुआ?”

तेनालीराम ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया – “महाराज, उन सिक्कों से मैंने इसी घाटी से उत्तम पौधे और उच्च कोटि के बीज खरीदे हैं। उन्हें हमारे राज्य की धरती में रोपा जाएगा। जब यह फलेंगे-फूलेंगे तो पूरा विजयनगर राज्य भी ऐसा ही हरा-भरा और सुंदर बन जाएगा। तब हमारे राज्य की प्रजा भी रोज इस स्वर्ग का आनंद ले पाएगी।”

महाराज भावुक हो उठे। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा –

“वाह तेनालीराम, तुमने मुझे केवल स्वर्ग ही नहीं दिखाया, बल्कि हमारे राज्य के लिए स्थायी सुख और समृद्धि का मार्ग भी खोज लिया।”

महाराज तेनालीराम से बहुत प्रसन्न होते हैं और उन्हें ढेरों इनाम देते हैं। दूसरी ओर जलन से भरे दरबारी और मंत्रिगण एक बार फिर मुँह लटकाए बैठे रह जाते हैं।

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