एक शुभ शुरुआत – करुणा और दान की प्रेरक कहानी
“एक शुभ शुरुआत” कहानी एक बच्चे सुमित की है, जो दीपावली के दिन दूसरों की मदद करने की प्रेरणा देता है। यह कहानी सिखाती है कि सच्ची खुशी बाँटने में है।
सुबह के करीब 9 बजे होंगे। घर के आँगन में दोनों भाई— अजय और सुमित ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रहे थे।
“माँ! इस बार मुझे सबसे बड़े वाले रॉकेट चाहिए।” — अजय अपनी माँ से कहने लगा।
“और मुझे लड़ी वाले पटाखे चाहिए। साथ में नए कपड़े और जूते भी।” — छोटा भाई सुमित भी जिद करते हुए बोला।
माँ ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – “हाँ-हाँ दिला देंगे, मगर अभी तो दीवाली में 1 हफ़्ता बाकी है, इतनी जल्दी क्या है?”
यह कहकर माँ ने बात को टालना चाहा, लेकिन बच्चे कहाँ मानने वाले थे। उन्होंने जिद करना जारी रखा। इतने में पापा भी ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर बाहर निकले। बच्चों की मुरझाई सूरत देखकर वे बोले – “बच्चो, ज़िद मत करो। आज मैं ऑफिस से जल्दी आ जाऊँगा..फिर हम सब मार्केट चलेंगे। वहाँ से नए कपड़े लेंगे, मिठाई और पटाखे भी, लेकिन अभी शांति से नाश्ता कर लो।”
पापा की बात सुनते ही दोनों भाइयों के चेहरे खिल उठे। अब उन्हें बस शाम का इंतज़ार था। शाम ढली तो दोनों भाई नए कपड़े पहनकर तैयार हो गए। फिर पापा के आते ही वे बाइक पर सवार होकर बाजार की ओर निकल पड़े।
वहाँ पहुँचकर देखा कि बाजार रोशनी से नहा रहा था। दुकानें जगमगा रही थीं, हवा में मिठाइयों की ख़ुशबू घुली थी। रंग-बिरंगे पटाखों की चमक बच्चों की आँखों में उतर रही थी।
“देखो पापा! अनार..और वो बड़ा वाला रॉकेट।” – उत्साहित होकर सुमित इशारा करने लगा।
इसके बाद खरीदारी शुरू हुई— कपड़े, मिठाई, लाइटें और पटाखे..खरीदारी का सिलसिला कुछ देर तक चलता रहा। देखते-देखते रात के आठ बज गए। बच्चे बहुत थक चुके थे, इसलिए शॉपिंग ख़त्म होते ही पापा और दोनों भाई घर की ओर रवाना हो गए।
जब वे लोग घर लौट रहे थे, तब रास्ते में अचानक बाइक झटके खाते हुए बंद हो गई। सौभाग्य से पास ही एक छोटा-सा गैरेज था। पापा बाइक लेकर वहाँ पहुँचे। बाइक को अच्छी तरह से जाँचने के बाद मिस्त्री ने बताया कि बाइक के इंजन में ख़राबी आ गई है, ठीक होने में थोड़ा वक़्त लगेगा।
अब चूँकि बाइक ठीक होने में अभी देर थी और बच्चे भूख से बेहाल थे, इसलिए पापा उन्हें पास ही मौजूद एक ढाबे पर ले गए। ढाबा साधारण लेकिन गरमजोशी भरा था। तीनों ने खाना मँगवाया। प्लेटें लगते ही दोनों बच्चे खाने पर टूट पड़े। जैसे ही सुमित ने खाना शुरू किया, उसकी नज़र ढाबे के बाहर खड़े कुछ बच्चों पर गई। चार-पाँच छोटे बच्चे, फटे हुए कपड़ों में, ठंड से सिकुड़ते हुए वहाँ खड़े थे। वे हर आते-जाते व्यक्ति से गुहार लगा रहे थे— भूखे थे शायद…
उन्हें इस हालत में देखकर सुमित को दया आ गई। उसने अपने पापा को यह नज़ारा दिखाते हुए कहा — “पापा, वो देखिए उन बच्चों को, बेचारे किस तरह से भोजन की आस में लोगों को पुकार रहे हैं लेकिन कोई नहीं सुन रहा…”
अपने बच्चे की करुणा और मासूमियत को देखकर पापा ने एक उपाय किया। उन्होंने ढाबे वाले से पाँच प्लेट भोजन तैयार करने को कहा और भोजन तैयार होते ही ले जाकर उन बच्चों को दे दिया। भोजन पाकर बच्चों के चेहरे खिल उठे। उस वक़्त उनकी मुस्कान ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो किसी अँधेरे कमरे में दीपक जला दिया गया हो।
घर लौटते वक़्त सुमित बहुत मायूस था। उसकी आँखों में उन ग़रीब बच्चों का ही चित्र क़ैद था। रोज़ उन बच्चों को ऐसे ही भोजन के लिए भटकना पड़ता होगा। बेचारे, कभी भरपेट भोजन कर भी पाते होंगे या नहीं— इन तमाम सवालों से सुमित जूझ रहा था। उसे उदास देखकर पापा ने उससे सवाल किया — “बेटा सुमित, क्या हुआ..इतना मायूस क्यों है तू?”
भारी मन के साथ सुमित ने कहा — “पापा, दरअसल मैं उन बच्चों के विषय में सोचकर दुखी हूँ। वे रोज़ इसी तरह भोजन की तलाश में रहते होंगे। उनकी ही तरह हमारे देश में न जाने और कितने होंगे जो भोजन के लिए दर-ब-दर भटकते होंगे, ठीक से अपना गुज़ारा नहीं कर पाते होंगे…”
“सही कह रहा है तू बेटा..हमारे देश में ऐसे न जाने कितने लोग हैं जिनके लिए दो वक़्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता है।”
“पापा, क्या हम इनके लिए कुछ कर सकते हैं? कुछ ऐसा जिससे इनकी मदद हो सके…”
इतनी कम उम्र में अपने बेटे की ऐसी सोच देखकर उसके पिता फूले नहीं समा रहे थे। उन्होंने अपने बेटे की बात को बड़ी गंभीरता से सुना और समझा। इसके बाद यह तय किया कि वे लोग इस दीवाली पर ग़रीबों में मिठाई, पटाखे और ज़रूरी सामान वितरित करेंगे। पापा का यह निर्णय सुनकर सुमित बहुत खुश हुआ। अब बस उसे दीवाली के दिन का इंतज़ार था।
देखते ही देखते दीवाली का दिन भी आ गया। घर अच्छी तरह से सजा हुआ था। अजय और सुमित दोनों ने नए कपड़े पहने हुए थे और दोनों भाई दीवाली का जश्न मनाने के लिए तैयार थे। दोपहर होते ही सारा परिवार एक साथ दान कार्य करने निकल पड़ा— मंदिर के पास, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, फुटपाथ इत्यादि जगहों पर मौजूद ग़रीबों को भोजन खिलाकर, उन्हें ज़रूरी वस्तुएँ भेंट करके, साथ ही मिठाई, नए वस्त्र तथा पैसे दान करके इस परिवार ने खूब दुआएँ बटोरीं।
शाम होते ही वे पुनः घर लौट आए। सुमित के लिए आज का अनुभव ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन अनुभव बन चुका था। इतने सारे ग़रीब लोगों की दुआएँ, प्रार्थनाएँ पाकर वह गद्गद हो रहा था। उसने अपने पिता से कहा — “आज इतनी सारी दुआएँ पाकर कितना अच्छा लग रहा है..पापा, अब से हम हर त्योहार पर इसी तरह ग़रीबों की मदद किया करेंगे ताकि हमारी वजह से उनके चेहरे पर भी मुस्कान आ सके।”
अपने बेटे की यह बात सुनकर उसके माता-पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। पापा तुरन्त इस बात के लिए राज़ी हो गए। यानी कि अब से हर बड़े त्योहार पर ग़रीबों को भोजन, वस्त्र, उपहार, पैसे आदि भेंट करने की प्रथा यह परिवार अपना रहा था और दीपावली के पावन अवसर पर उन्होंने इसकी शुभ शुरुआत कर दी थी।












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