तेनालीराम की कहानी: कुत्ते की दुम और मनुष्य का स्वभाव
तेनालीराम की इस कहानी में कुत्ते की दुम को केंद्र में रखकर यह सिद्ध किया गया है कि मनुष्य का मूल स्वभाव बदला नहीं जा सकता, केवल समय-विशेष में दबाया जा सकता है।
राजा कृष्णदेवराय के दरबार में एक दिन यह बहस छिड़ी कि क्या मनुष्य का स्वभाव बदला जा सकता है या नहीं। कुछ दरबारी मानते थे कि मनुष्य का स्वभाव बदला जा सकता है, जबकि कुछ का मत था कि नहीं, मनुष्य का स्वभाव नहीं बदला जा सकता।
इसी बीच एक दरबारी बोला- “महाराज, जैसे कुत्ते की दुम लाख प्रयासों के बावजूद भी सीधी नहीं की जा सकती, वैसे ही मनुष्य का मूल स्वभाव भी नहीं बदला जा सकता।”
तभी दूसरा दरबारी बीच में बोल पड़ा- “ऐसा नहीं है महाशय! प्रयास करने पर तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। यदि कोशिश की जाए तो कुत्ते की दुम भी सीधी की जा सकती है और मनुष्य का स्वभाव भी बदला जा सकता है।”
राजा को यह बहस अत्यंत रोचक लगी। उन्होंने कहा- “बात तो विचारणीय है। क्यों न हम प्रयास कर देखें कि वास्तव में कुत्ते की दुम सीधी हो सकती है या नहीं?”
फिर क्या था, राजा ने कुछ चुनिंदा दरबारियों को छह महीने तक एक-एक कुत्ते का पिल्ला पालने का आदेश दिया। पिल्लों की देखभाल के लिए सभी दरबारियों को प्रति माह दस स्वर्ण मुद्राएँ भी दी गईं। साथ ही यह स्पष्ट निर्देश भी दिया गया कि इन छह महीनों में सभी को अपने-अपने पिल्ले की दुम को सीधा करने का प्रयास करना है।
तेनालीराम को भी यह कार्य सौंपा गया। पिल्ला मिलते ही सभी दरबारी अपनी-अपनी तरकीबें आजमाने में लग गए। किसी ने पिल्ले की दुम पर भारी बोझ बाँध दिया, ताकि वह सीधी हो जाए। किसी ने पीतल की एक सीधी नली में दुम डाल दी। कोई रोज उसकी दुम की मालिश कराने लगा, तो किसी ने तंत्र-मंत्र का सहारा लिया।
उधर, तेनालीराम ने अपने पिल्ले को भूखा रखने का निश्चय किया। वे उसे केवल उतना ही भोजन देते थे, जिससे वह जीवित रह सके। समय के साथ पिल्ला दुर्बल होता गया और उसकी शक्ति क्षीण होती चली गई।
इसी तरह छह महीने बीत गए। निर्धारित समय पर सभी दरबारी अपने-अपने पिल्लों को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। पहले पिल्ले की दुम से जैसे ही वजन हटाया गया, वह तुरंत ऊपर को मुड़ गई। दूसरे पिल्ले की दुम से नली निकाली और वह भी झट से टेढ़ी हो गई। बाकी पिल्लों की दुमें भी टेढ़ी ही थीं।
जब तेनालीराम ने अपना पिल्ला दरबार में प्रस्तुत किया, तो वह अधमरा-सा लग रहा था। उसके अंग शिथिल और बेजान थे। तेनालीराम ने राजा से कहा- “ये देखिये महाराज, मैंने इसकी दुम सीधी कर दी है।”
राजा ने चकित होकर कहा- “अरे तेनालीराम! यह तुमने क्या किया! तुमने तो इसे भूखा ही मार डाला! ऐसा क्यों किया तुमने?”
तेनालीराम ने विनम्रतापूर्वक कहा- “मुझे क्षमा कीजिए महाराज। मैंने तो केवल आपके आदेशानुसार इस पिल्ले की दुम को सीधा करने का प्रयास किया है। मैं इसे प्रतिदिन केवल उतना ही भोजन देता था जिससे यह जीवित रह सके, इसी कारण इसका शरीर दुर्बल होता गया और अब इसमें अपनी दुम को ऊपर उठाने की भी शक्ति नहीं बची है।”
राजा ने गंभीर होकर प्रश्न किया—”हाँ, तो अब जबकि इस कुत्ते की दुम सीधी हो गई है, इसका क्या तात्पर्य निकाला जाए तेनालीराम? मनुष्य का स्वभाव भी बदला जा सकता है या नहीं?”
तेनालीराम ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया- “महाराज, फिलहाल तो इस कुत्ते दुम सीधी है, लेकिन यदि इसे दो दिन तक भरपेट भोजन मिल जाए, तो इसकी दुम पुनः पहले की भाँति टेढ़ी हो जाएगी…मनुष्य का स्वभाव भी कुछ इसी प्रकार होता है। जब तक वह दुख, अभाव या विवशता में रहता है, वह सीधा, विनम्र और शांत दिखाई देता है। परंतु जैसे ही उसे सुख-सुविधाएँ और शक्ति पुनः प्राप्त होती हैं, उसका वास्तविक स्वभाव लौट आता है…
..इसलिए यह कहा जा सकता है कि जैसे इस दुम के स्वभाव को केवल कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, बदला नहीं जा सकता, वैसे ही मनुष्य के मूल स्वभाव को भी केवल दबाया जा सकता है, बदला नहीं जा सकता।”
तेनालीराम के इस उत्तर को सुनकर पूरा दरबार मौन हो गया। राजा कृष्णदेवराय ने तेनालीराम की बुद्धिमत्ता और व्यावहारिक ज्ञान की खूब प्रशंसा की तथा उन्हें सम्मानपूर्वक पुरस्कृत भी किया।












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