जितनी लंबी चादर उतने ही पैर पसारो – बीरबल की सीख

अकबर-बीरबल की यह कहानी “जितनी लंबी चादर उतने ही पैर पसारो” हमें सिखाती है कि व्यक्ति को अपनी सीमाओं में रहना चाहिए। बीरबल की बुद्धिमानी का अद्भुत उदाहरण।

बादशाह अकबर के दरबार में अक्सर दरबारी यह चर्चा करते रहते थे कि बादशाह हर बार बीरबल की ही बुद्धि की प्रशंसा क्यों करते हैं। उन्हें लगता था कि दरबार में और भी कई समझदार लोग हैं, पर ख्याति केवल बीरबल को ही है।

एक दिन अकबर ने सोचा कि क्यों न अपने सभी दरबारियों की परीक्षा ली जाए। उन्होंने अपने सभी मंत्रियों और दरबारियों को अपने कक्ष में बुलाया। जब सब उपस्थित हुए तो अकबर ने एक चादर दिखाते हुए कहा – “यह चादर दो हाथ लंबी और दो हाथ चौड़ी है। अगर कोई इस चादर से मुझे सिर से लेकर पैर तक पूरी तरह ढँक दे, तो मैं उसे सचमुच बुद्धिमान मान लूँगा।”

बादशाह की यह आसान-सी लग रही शर्त सुनकर सभी दरबारी उत्साह से आगे बढ़े। एक ने चादर सिर की ओर से ओढ़ाई तो पैर बाहर निकल आए, किसी ने पैर ढँकने की कोशिश की तो सिर खुल गया। दरबारियों ने हर तरह से कोशिश की— कभी आड़ी, कभी तिरछी। पर कोई भी बादशाह को पूरी तरह नहीं ढँक सका।

आख़िर में बादशाह अकबर ने बीरबल को बुलाया और वही चादर उन्हें थमाते हुए कहा – “लो बीरबल, अब तुम्हारी बारी।”

बीरबल मुस्कराए और बोले – “जी हुज़ूर, ज़रा अपने पैर सिकोड़ लीजिए।”

बादशाह अकबर ने वैसा ही किया— उन्होंने अपने पैर सिकोड़ लिए। बस फिर क्या था, बीरबल ने सहजता से चादर ओढ़ाई और बादशाह सिर से पांव तक पूरी तरह ढँक गए।

कक्ष में सन्नाटा छा गया। सभी दरबारी बीरबल की चतुराई देखकर हैरान थे। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि इतना आसान उपाय उनके दिमाग में क्यों नहीं आया। तब बीरबल ने विनम्रता से कहा – “महाराज, चादर जितनी हो, पैर उतने ही फैलाने चाहिए। कहने का अर्थ ये कि जो व्यक्ति अपनी सीमाओं में रहना जानता है, वही सच्चा बुद्धिमान होता है।”

बीरबल की यह बात सुनकर उपस्थित दरबारियों का चेहरा लटक गया। इस प्रकार एक बार फिर बीरबल ने अपनी बुद्धिमानी का परिचय देते हुए न सिर्फ बादशाह का दिल जीता बल्कि अपने सभी आलोचकों के मुंह भी बंद कर दिए।

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