कभी इंसां है क्या समझा नहीं था – ग़ज़ल by बलजीत सिंह बेनाम

बलजीत सिंह बेनाम की यह ग़ज़ल इंसानियत और आत्मा की सच्चाई को उजागर करती है।
हर शेर हमें याद दिलाता है कि सच्चा ईमान, प्यार और इंसानियत जिस्म से नहीं — रूह से जुड़ी होती है।
“कभी इंसां है क्या समझा नहीं था, ख़ुदा को इसलिए पाया नहीं था।”

कभी इंसां है क्या समझा नहीं था – ग़ज़ल

कभी इंसां है क्या समझा नहीं था?
ख़ुदा को इसलिए पाया नहीं था!

हमारा प्यार रूहों का मिलन था!
फ़क़त जिस्मो तलक़ फैला नहीं था!

गुज़ारी उम्र सारी मुफ़लिसी मैं!
मगर ईमाँ कभी बेचा नहीं था!

अता की बज़्म को जिसने बुलंदी!
उसी का बज़्म में चर्चा नहीं था!

परखने पर निराशा हाथ आती!
ज़रूरत पर तभी परखा नहीं था!

✍️ यह रचना हमें
बलजीत सिंह बेनाम (हरियाणा, हाँसी)
द्वारा प्राप्त हुई है।
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