तेरे ग़म में बिखर न जाए कहीं
यह ग़ज़ल मोहब्बत के उस दर्द को बयां करती है जहाँ जुदाई का डर और चाहत की तड़प साथ-साथ चलते हैं।
हर शेर में दिल की गहराई, सावधानी और प्यार की नर्मी झलकती है –
“तेरे ग़म में बिखर न जाए कहीं, वो जुदा हो के मर न जाए कहीं।”
तेरे ग़म में बिखर न जाए कहीं!
वो जुदा हो के मर न जाए कहीं!
सिर्फ़ खुशियाँ क़बूल हैं इसको!
आँख आँसू से ड़र न जाए कहीं!
मन मेरा तेरे प्यार का प्यासा!
ये शजर बेसमर न जाए कहीं!
हर घड़ी घूरता है सूरज को!
आग तुझमें उतर न जाए कहीं!
शे ‘र कहने में सावधानी हो!
शायरी का असर न जाए कहीं!
✍️ यह रचना हमें
बलजीत सिंह बेनाम (हरियाणा, हाँसी)
द्वारा प्राप्त हुई है।
बलजीत सिंह बेनाम (हरियाणा, हाँसी)
द्वारा प्राप्त हुई है।




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