मैं सबसे छोटी होऊँ: माँ-बेटी के स्नेह की कविता

इस कविता में एक बेटी की कोमल इच्छा झलकती है—वह हमेशा माँ के आँचल में रहना चाहती है, माँ का स्नेह और सुरक्षा कभी नहीं खोना चाहती।

मैं सबसे छोटी होऊँ,
तेरी गोदी में सोऊँ!
तेरा अंचल पकड़-पकड़कर
फिरूँ सदा माँ तेरे साथ,
कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ!

बड़ा बनाकर पहले हमको
तू पीछे छलती है मात!
हाथ पकड़ फिर सदा हमारे
साथ नहीं फिरती दिन-रात!

अपने कर से खिला, धुला मुख,
धूल पोंछ, सज्जित कर गात!
थमा खिलौने, नहीं सुनाती
हमें सुखद परियों की बात!

ऐसी बड़ी न होऊँ मैं,
तेरा स्नेह न खोऊँ मैं!
तेरे अंचल की छाया में
छिपी रहूँ निस्पृह, निर्भय,
कहूँ—दिखा दे चंद्रोदय!

‘सुमित्रानंदन पंत’ द्वारा रचित इस कविता में एक बेटी की मासूम भावनाएँ व्यक्त की गई हैं, जो सदा अपनी माँ के अंचल में रहना चाहती है। वह चाहती है कि वह कभी बड़ी न हो, ताकि माँ का स्नेह, उसका साथ और सुरक्षा हमेशा उसे मिलती रहे।

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