पैसों का सदुपयोग

पैसों का सदुपयोग करने की सीख देती एक दिल को छू जाने वाली कहानी, जिसमें रोहन अपनी गलती से सीखकर समझदार बनता है। पढ़ें पूरी प्रेरणादायक कहानी।

“माँ, एक नया क्रिकेट बैट चाहिए”- 10 वर्ष का रोहन अपनी माँ से नए क्रिकेट बैट के लिए जिद कर रहा था। फूला हुआ चेहरा और आँखों में वो मासूमियत जो किसी का भी दिल पिघला दे! मगर माँ इस बार नर्म नहीं हुईं। उन्होंने ऊँची आवाज में जवाब दिया- “नया बैट क्यों चाहिए? तेरे पास पहले से ही एक बैट है न!”

“हाँ, पर वो अब पुराना हो गया है मम्मी। उससे शॉट भी अच्छी तरह नहीं लगते।”

“लेकिन टूटा तो नहीं है न, खेलने लायक तो है अभी। जब तक कोई वस्तु चल सकती है, हमें उसे चलाना चाहिए। फिजूलखर्ची करना ठीक बात नहीं…इसलिए अभी तुम्हें बैट नहीं मिलेगा। टेबल पर नाश्ता लगा दिया है। जाओ, नाश्ता कर लो।”

रोहन कुछ पल खड़ा रहा, फिर पैर पटकता हुआ अपने कमरे में चला गया। थोड़ी देर बाद पापा नाश्ते के लिए आए। टेबल पर रोहन नहीं था, यह देख पापा पूछ बैठे- “रोहन कहाँ है?”

“पापा, रोहन तो मम्मी से नाराज होकर कमरे में बैठा है।”- रोहन की बड़ी बहन अदिति ने बताया।

फिर माँ ने भी सारा किस्सा सुना डाला। सारी बात जानने के बाद पापा कुछ देर सोचते रहे। फिर उठकर बच्चों के कमरे में गए। रोहन खिड़की के पास बैठा था। पापा ने उसे अपने पास बुलाया। बहन अदिति और माँ भी वहाँ आ गईं।

पापा दोनों बच्चों से कहने लगे- “देखो बच्चों, अब से तुम दोनों को हर महीने 500 रुपये मिला करेंगे, अपनी जेबखर्ची के लिए। पर शर्त ये है कि तुम्हें अपनी जरूरत की हर वस्तु उन्हीं पैसों से लेनी होगी। फिर चाहे वो खाने की कोई चीज हो, पढ़ाई की कोई सामाग्री हो या फिर कोई खेलने की वस्तु। महीने के आखिर में तुमसे हिसाब माँगा जाएगा, और तुम्हें एक-एक पैसे का हिसाब देना होगा। इसलिए पैसे सोच-समझकर खर्च करना।”

दोनों बच्चों को 500-500 रुपये दे दिए जाते हैं। रुपये मिलते ही रोहन खुशी से झूम उठा। वो दौड़कर गया और 150 रुपये का एक नया बैट खरीद लिया। साथ ही 40 रुपये की 2 नई क्रिकेट बॉल भी ले ली। आते वक्त रास्ते में 10 रुपये की पानीपुरी भी खा ली- यानि कुल मिलाकर पहले ही दिन उसने 200 रुपये फिजूल खर्च कर दिए।

उधर उसकी बहन अदिति को जो पैसे मिले थे, वो उनके 4 हिस्से कर लेती है- 200 रुपये स्कूल की जरूरतों के लिए, 100 रुपये खाने-पीने की सामाग्री के लिए, 150 रुपये अपनी पसंद की चीजों के लिए और 50 रुपये हर महीने बचत में…

अदिति अपने पैसे बहुत सोच-समझकर और अपने बनाए बजट के हिसाब से ही खर्च कर रही थी। वहीं रोहन का जब मन करता वो पैसे खर्च कर देता, बिना कुछ सोचे-समझे…

इसी तरह महीने के 20 दिन बीत जाते हैं। अदिति के पास अब भी पैसे थे, मगर रोहन के पास एक रुपया भी नहीं बचा था। शाम को वो अपने कमरे में उदास बैठा था। उसे उदास देख अदिति ने पूछा- “क्या हुआ रोहन, उदास क्यों है?”

रोहन बोला- “स्कूल में प्रोजेक्ट मिला है। उसके लिए कुछ सामान खरीदना है, पर मेरे पास पैसे नहीं बचे। मम्मी से माँगूंगा तो डाँट पड़ेगी- समझ नहीं आ रहा क्या करूं।”

“देखा रोहन, मैं हमेशा तुझसे कहती थी कि पैसों को बचाकर रख। फिजूलखर्च मत कर, पूरा महीना चलाना है हमें, लेकिन तू कभी मेरी सुनता ही नहीं था…यदि आगे भी तू ऐसा ही करेगा तो हर बार इसी तरह महीना खत्म होने से पहले तेरे पैसे खत्म हो जाया करेंगे…और जरूरत पड़ने पर तेरे पास कुछ नहीं होगा। इसलिए अगली बार से अपने पैसों को सोच-समझकर खर्च करना।

रोहन उदास चेहरे के साथ अपनी बहन की बात पर हामी भर देता है। भाई को यूं उदास देख अदिति को अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए वो कुछ पैसे रोहन को दे देती है, ताकि वो अपने प्रोजेक्ट के लिए जरूरी सामान खरीद सके…

इसी तरह देखते ही देखते महीना बीत जाता है, और फिर आता है, महीने का अंतिम दिन। पापा दोनों बच्चों को बुलाकर हिसाब माँगते हैं। अदिति के पास अपनी नोटबुक में हर खर्च का हिसाब लिखा हुआ था- कुल 400 रुपये खर्च हुए, 50 रुपये रोहन को उधार दिए (प्रोजेक्ट और बाकी जरूरी काम के लिए), और 50 रुपये अब भी उसके पास सुरक्षित थे।

अदिति का हिसाब देखकर पापा बहुत खुश हुए। अब बारी थी रोहन की। जब रोहन से पापा ने हिसाब माँगा तो उसने मुँह लटकाकर कहा- “वो…एक बैट और दो बॉल ली थीं। कुछ पैसे पानीपुरी खाने में खर्च हो गए। फिर चिप्स, पॉपकॉर्न और बाकी हिसाब याद नहीं…”

रोहन की बात सुनकर पापा गंभीर स्वर में बोले- “देखो रोहन, फिजूलखर्च करना अच्छी आदत नहीं है। हर बार खर्च करने से पहले सोचो- क्या ये चीज वाकई जरूरी है? इसके बिना काम चल सकता है क्या? अगर चल सकता है तो पैसे खर्च मत करो। फिजूलखर्च करने वाले इंसान की जेब जरूरत पड़ने पर खाली ही रह जाती है और जो व्यक्ति समझदारी से पैसे खर्च करता है उसकी जेब जरूरत के समय भी भरी रहती है।”

रोहन को पापा की कही हर एक बात समझ आ रही थी। उसे अपनी गलती का एहसास भी हो रहा था- “पापा, आप सही कह रहे हैं। मुझे समझ आ गया है कि पैसों को फिजूलखर्च करना कितना गलत है। मैं आपसे वादा करता हूँ कि अगली बार से मैं सोच-समझकर और जरूरत पड़ने पर ही अपने पैसे खर्च किया करूँगा।”

अगले महीने जब दोबारा पैसों का हिसाब होता है तब पापा देखते हैं कि रोहन ने न सिर्फ कम पैसे खर्च किए थे बल्कि 100 रुपयों की बचत भी की थी। ये देखकर पापा बहुत खुश होते हैं। मम्मी भी आज अपने बेटे पर बहुत गर्व महसूस कर रही थीं, और करें भी क्यों न…आखिरकार उनका बेटा ‘पैसों का सदुपयोग’ करना जो सीख गया था।

मुख्य शिक्षाएँ:

  1. जरूरत और चाहत में फर्क समझें:
    रोहन पहले अपने शौक के लिए पैसे खर्च करता है, लेकिन अंत में समझता है कि ज़रूरतें ज़्यादा महत्वपूर्ण होती हैं।
  2. बजट बनाना सीखें:
    अदिति की तरह पैसे को अलग-अलग हिस्सों में बाँटना सीखना चाहिए – यह फिजूलखर्ची से बचाता है।
  3. बचत की आदत डालना जरूरी है:
    पैसे की बचत भविष्य की जरूरतों में काम आती है, जैसे अदिति ने रोहन की मदद की।
  4. गलतियों से सीखना:
    कहानी यह भी सिखाती है कि गलती करना गलत नहीं, पर उसे दोहराना नहीं चाहिए। रोहन अपनी गलती से सीखता है।
  5. पैरेंट्स की भूमिका:
    माता-पिता बच्चों को पैसों की कीमत समझाने के लिए बहुत अच्छा तरीका अपनाते हैं – जेबखर्च देना और हिसाब लेना।
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