अपराधी बकरी: तेनालीराम की बुद्धिमानी की कहानी

अपराधी बकरी कहानी में राजा कृष्णदेव राय, माली और तेनालीराम की चतुराई का अद्भुत किस्सा है। जानिए कैसे तेनालीराम ने न्याय दिलाया और निर्दोष को बचाया।

एक बार की बात है। विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय अपने पड़ोसी राज्य की यात्रा पर गए थे। वहाँ घूमते-घूमते उनकी दृष्टि एक अद्भुत पुष्प-वृक्ष पर पड़ी। उसके फूलों में ऐसी मोहकता थी कि लगे जैसे प्रकृति ने स्वयं अपनी मुस्कान उनमें उतार दी हो। महाराज उन पुष्पों से इतने मोहित हो गए कि उस वृक्ष का पौधा अपने साथ राजमहल ले आए।

राजमहल पहुँचकर उन्होंने माली को बुलाया और उसे आदेश दिया— “इस पौधे को मेरे विश्राम कक्ष के सामने वाले उपवन में लगा दो। ध्यान रहे, पौधे की रक्षा तुम्हें अपने प्राणों से भी बढ़कर करनी होगी। यदि इस पर कोई भी आँच आई, तो तुम्हें मृत्यु दंड मिलेगा।”

राजा के आदेश का भार माली के हृदय पर पहाड़ की तरह उतर गया। वह उस पौधे की देखभाल इस तरह करने लगा, जैसे कोई माँ अपने बच्चे की देखभाल करती है। सुबह उसे पानी देता, पत्तियों को सँवारता, धूप-छाँव का ध्यान रखता। महाराज भी जब-जब उस पौधे को देखते, उनके हृदय में शांति और प्रसन्नता भर जाती। धीरे-धीरे पौधा राजा के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया।

फिर एक सुबह जब महाराज उपवन पहुँचे तो उनकी आँखें चकित रह गईं। वह पौधा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। राजा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। तुरंत माली को बुलाया गया। राजा के पूछने पर काँपते स्वर में माली बोला— “महाराज, क्षमा करें…वह पौधा मेरी बकरी ने खा लिया है।”

यह सुनते ही राजा का क्रोध आसमान छूने लगा। उन्होंने क्रोधित स्वर में घोषणा की— “तुम्हारी लापरवाही ने मेरी प्रिय वस्तु को नष्ट किया है। तुम्हें मृत्यु दंड दिया जाएगा।”

माली अपने प्राणों की भीख माँगता रहा लेकिन राजा ने उसकी एक न सुनी। उन्होंने माली को कारागृह में डालने का आदेश दे दिया और कहा कि आज से ठीक सातवें दिन इस माली को फाँसी पर चढ़ा दिया जाए।

माली की पत्नी जब यह समाचार सुनती है तो वह भागती हुई राजमहल पहुँचती है, लेकिन सैनिक उसे भीतर प्रवेश नहीं करने देते- जिसके पश्चात टूटे हुए मन से वह अपने घर लौट आती है। पड़ोसियों को जब इस घटना का पता चलता है तो वे माली की पत्नी को तेनालीराम जी से मदद माँगने की सलाह देते हैं।

अब आशा की एक किरण लेकर माली की पत्नी तेनालीराम के घर पहुँची और उन्हें अपनी सारी व्यथा सुना डाली। तेनालीराम कुछ क्षण सोचते हैं, फिर शांत स्वर में कहते हैं— “घबराओ मत, तुम्हारे पति को कुछ नहीं होगा…अब जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो।”

फिर तेनालीराम माली की पत्नी को सारी योजना बता देते हैं। अगली सुबह नगर के चौराहे पर एक विचित्र दृश्य देखने को मिला। माली की पत्नी अपनी बकरी को डंडे से मार रही थी और बकरी दर्द से कराह रही थी। देखते-ही-देखते वहाँ काफी भीड़ इकट्ठा हो गई। खबर राजमहल तक भी पहुँच गई।

खबर सुनते ही राजा ने तुरंत उस औरत को राजदरबार में पेश करने का आदेश दिया। फिर राजा के सामने माली की पत्नी और उसकी बकरी को पेश किया गया। क्रोधित स्वर में राजा ने माली की पत्नी से पूछा— “तुमने इस बेजुबान जीव के साथ इतनी क्रूरता क्यों की?”

वह रोते हुए बोली— “महाराज, यह वही बकरी है जिसने आपके प्रिय पौधे को खा लिया था। इसी के कारण आज मेरा सिंदूर खतरे में है…इसलिए मैं इसे दंडित कर रही थी। मेरे पति को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई है, जबकि उनका कोई दोष ही नहीं है। दोष तो इस बकरी का है, जिसने आपके पौधे को खा लिया, और इस बकरी से पहले दोष उन द्वारपालों का है, जिनके होते हुए भी बकरी उपवन में आ गई। बावजूद इसके दंडित मेरे पति को किया जा रहा है जिन्होंने अपनी जान से ज्यादा कीमती मानकर उस पौधे की देखभाल की थी। आप राजा होकर भी यदि निर्दोष लोगों को अकारण ही म्रत्युदंड देने लग जायेंगे तो आम प्रजा किस पर भरोसा करेगी महाराज?”

माली की पत्नी की बातें सुनकर राजा शर्मिंदा हो गए। उनका सारा क्रोध क्षण भर में गायब हो गया और साथ ही उन्हें अपनी गलती का एहसास भी हो गया। उन्होंने तुरंत माली को कैद से आजाद करने का आदेश दे दिया। इसके बाद राजा ने जिज्ञासावश माली की पत्नी से पूछा— “एक बात बताओ, अपने पति को बचाने का यह उपाय तुम्हें किसने सुझाया?”

माली की पत्नी ने सिर झुकाकर उत्तर दिया— “महाराज, यह उपाय मुझे पंडित तेनालीराम जी ने सुझाया था।”

राजा मुस्कुराए- वे जानते थे कि तेनालीराम ने आज उनके हाथों एक निर्दोष को दंडित होने से बचा लिया था। राजा ने प्रसन्न होकर तेनालीराम को स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं और दरबार में उनकी खूब प्रशंसा की।

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