परिवार का सही मतलब – दिल को छू लेने वाली कहानी
यह कहानी बताती है कि असली परिवार वही है जहाँ सभी एक-दूसरे को समझते हैं, समय देते हैं और मिलकर जीवन का आनंद लेते हैं।
गाँव के सरकारी विद्यालय के प्रधानाचार्य केशव नारायण जी हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। गाँव में वे अपनी पत्नी शारदा देवी के साथ रहते थे। उनका बेटा विजय शहर में नौकरी करता था और वहीं अपनी पत्नी रूपाली और अपने दो बच्चे, रिंकी और आर्यन के साथ रहता था।
एक शाम केशव नारायण जी अपनी पत्नी के साथ घर के आँगन में बैठे थे, तभी उनकी पत्नी उनसे कहने लगी- “सुनिए, आपका रिटायरमेंट हो चुका है…स्कूल के कार्यभार से भी आप मुक्त हो चुके हैं। अब यहाँ गाँव में अकेले रहकर क्या करेंगे? चलिए शहर चलते हैं, अपनी बहू और बेटे के पास। बाकी जीवन वहीं अपने परिवार के साथ रहकर बिताएंगे।”
केशव नारायण जी अपनी धर्मपत्नी की बात पर सहमति जताते हैं। अगली सुबह वे लोग शहर के लिए रवाना हो जाते हैं। निकलने से पहले बेटे और बहू को खबर कर दी जाती है। जब वे लोग घर पहुँचते हैं तो बेटा और बहू उनका स्वागत करते हैं। अब वे लोग यहीं सबके साथ रहने लगे थे।
साथ रह तो रहे थे लेकिन फिर भी पास नहीं थे। दरअसल यहाँ पहुँचकर केशव नारायण जी ने ध्यान दिया कि पूरा परिवार आपस में एकदम कटा-कटा सा रहता है…बेटे विजय का सारा ध्यान ऑफिस के कामों में लगा रहता है। बहू भी अधिकतर समय घर के काम और अपने निजी कामों में ही लगी रहती है। पोता आर्यन भी दिनभर मोबाइल और वीडियो गेम्स में लगा रहता है। बस उनकी पोती रिंकी ही थी जो दादा-दादी के साथ कुछ समय बिता लिया करती थी, बाकी लोगों के पास तो समय ही नहीं था।
इस बात को लेकर केशव नारायण जी बड़े चिंतित थे। वे अपने कमरे में बैठे अपनी पत्नी से इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे- “यहाँ तो सब एक-दूसरे से कितना अलग-अलग रहते हैं। बहू-बेटे में वो एक-दूसरे के प्रति समर्पण नजर नहीं आता। बच्चे भी एकसाथ नहीं रहते। ये लोग साथ होकर भी पास नहीं हैं। हमें कुछ करना चाहिए।”
“जी, आप सही कह रहे हैं। अब इन सबको परिवार का मतलब हमें ही समझाना होगा…”
दोनों अब दृढ़ निश्चय कर चुके थे। पास ही रिंकी बैठी थी। वह भी अपने दादा-दादी का साथ देने के लिए तैयार हो जाती है।
सबसे पहले शारदा देवी अपनी बहू के पास जाती हैं…वह किचन में खाना तैयार कर रही थी। उसके पास जाकर सास कहने लगी- “बेटा रूपाली, तुम दिनभर इतना काम करती हो, कभी आराम भी कर लिया करो। अच्छा एक काम करो, मैं यहाँ खाना बनाती हूँ, तुम जाकर थोड़ा आराम कर लो।”
“अरे नहीं मम्मी जी, आप क्यों तकलीफ ले रही हो? मैं कर लूंगी।”
“अरे नहीं बेटी, आज मुझे खाना बनाने दो। मैं भी बहुत अच्छा खाना बनाती हूँ। तुम्हारे बाबूजी तो मेरे खाने की तारीफ करते थकते नहीं हैं।”
सास की जिद के आगे बहू की एक न चली। फिर रूपाली अपने कमरे में जाकर आराम करने लगी। इसी बीच रिंकी आकर अपनी माँ से सिर में तेल मालिश करने को कहती है। रूपाली चूंकि खाना बनाने के काम से फ्री हो चुकी थी, इसलिए वह अपनी बेटी के सिर में तेल मालिश करने लगती है।
उधर केशव नारायण जी अपने पोते के पास जाते हैं। वह मोबाइल में गेम खेल रहा होता है। दादाजी उसके पास जाकर कहते हैं- “बेटा, क्या कर रहे हो?”
“मोबाइल में गेम खेल रहा हूँ दादाजी, क्रिकेट!”
“ला दिखा, मैं भी खेलूं जरा।”
दादाजी गेम खेलने लगते हैं। वह काफी अच्छे से गेम खेल रहे थे। उन्हें इतने अच्छे से गेम खेलता देख आर्यन कहता है- “वाह दादाजी, आप तो इतना अच्छा खेल रहे हो…असली में भी आपको इतने अच्छे से क्रिकेट खेलना आता है?”
“आता है मतलब! अरे हम अपने जमाने के क्रिकेट चैम्पियन रह चुके हैं बेटा।”
“अच्छा! आपको पता है दादाजी, पापा भी बहुत अच्छा क्रिकेट खेलते हैं।”
“अरे तेरे पापा को भी क्रिकेट खेलना मैंने ही तो सिखाया है।”
“अच्छा! तो चलिए न, क्रिकेट खेलते हैं। मैं पापा को भी बुलाकर लाता हूँ।”
“हाँ, उसे भी बुला ला। वैसे भी आज रविवार है, वो दिनभर आराम ही करने वाला है।”
आर्यन अपने पापा को बुलाने जाता है। पहले तो विजय आने से इनकार करता है, लेकिन फिर मान जाता है। अब तीनों एकसाथ घर के आंगन में क्रिकेट खेलने लगते हैं। उधर तेल मालिश हो जाने के बाद रिंकी भी अपनी माँ को लेकर आंगन में आ जाती है।
फिर रिंकी अपनी माँ से क्रिकेट खेलने के लिए जिद करने लगती है- “चलिए न माँ, हम भी खेलते हैं। बहुत मजा आएगा।”
रिंकी के बहुत जिद करने पर रूपाली कहती है- “अच्छा ठीक है, मैं खेलूंगी नहीं। बस अंपायर बन जाऊंगी। तुम सब खेलना।”
अब सभी लोग एक साथ क्रिकेट खेलने लगते हैं। उधर दादीजी ने भी भोजन तैयार कर लिया था। खेलने के बाद सब लोग एक साथ खाना खाने के लिए बैठते हैं, तभी रूपाली सबसे कहती है- “आप सबको पता है, आज खाना मम्मी जी ने बनाया है।”
यह सुन विजय हर्षित स्वर में कहता है- “अरे वाह, मम्मी के हाथ का खाना! आज बहुत समय बाद मम्मी के हाथ का खाना खाऊँगा।”
बच्चे भी दादी के हाथ का खाना खाने के लिए उत्सुक थे। सबको खाना परोसा जाता है। खाना खाते ही सब दादी की तारीफ करने लगते हैं। इसी बीच आर्यन कहता है- “वाकई, आज का दिन बहुत यादगार रहा। पहले सबके साथ क्रिकेट खेलकर मजा आया, और अब दादी के हाथ का इतना स्वादिष्ट खाना खाकर तो और भी मजा आ रहा है। पापा, अबसे हम हर रविवार ऐसे ही साथ मिलकर क्रिकेट खेला करेंगे और फिर दादी के हाथ का खाना खायेंगे।”
“हाँ हाँ बेटा, जरूर।”- विजय अपने बेटे की बात पर हामी भरता है।
यह सब बातें सुनकर केशव नारायण जी कहते हैं- “आज पहली बार तुम सबको इतना खुश देखकर अच्छा लग रहा है। जब से मैं यहाँ आया हूँ, मैंने कभी तुम सबको एक साथ समय बिताते नहीं देखा। हर कोई बस अपने-अपने कामकाज में लगा रहता है। विजय ऑफिस से थका-हारा आता है और खा-पीकर सो जाता है। बहू सारा दिन घर के काम में लगी रहती है और आर्यन मोबाइल गेम में लगा रहता है…
..विजय बेटा, न तो तुम कभी अपनी पत्नी के लिए समय निकालते हो और न ही अपने बच्चों के लिए! माना तुम्हें काम की चिंता रहती है, पर इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम अपने परिवार को बिल्कुल ही समय न दो! बेटा, परिवार का मतलब सिर्फ एक छत के नीचे रहना नहीं होता। परिवार का मतलब होता है एक-दूसरे के लिए वक्त निकालना, साथ में अच्छे पल बिताना और एक-दूसरे की भावनाओं को समझना।”
विजय को अपने बाबूजी की बात समझ आ जाती है। वह उनसे वादा करता है कि अब से वह अपने परिवार के लिए भी समय निकाला करेगा।
अब सब लोग हँसी-खुशी एकसाथ रहते थे। सास किचन में अपनी बहू की मदद किया करती थी, दोनों बच्चे अब दादाजी के साथ अधिकतर समय बिताते थे, विजय भी अब अपने परिवार के लिए समय निकालने लगा था। कुल मिलाकर, वास्तव में अब वे एक परिवार की भाँति रहने लगे थे।












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