ईमानदारी का फल
यह कहानी भैरवपुर गाँव के सूरज की है, जिसने अपनी ईमानदारी से एक गुम हुए कीमती कंगन को उसके असली मालिक तक पहुँचाया। उसकी सच्चाई और मेहनत ने न केवल उसकी इज्जत बढ़ाई बल्कि उसके जीवन में भी खुशियाँ लेकर आई।
भैरवपुर गाँव में सूरज नाम का एक ईमानदार और मेहनती व्यक्ति रहता था। वह गाँव के सबसे प्रतिष्ठित व्यापारी रामनाथ जी के यहाँ नौकरी करता था, जो कि अनाज और मसालों का व्यापार करते थे। सूरज की ईमानदारी और मेहनती स्वभाव के कारण सेठ रामनाथ और उनकी धर्मपत्नी शारदा उसे बहुत पसंद करते थे।
एक बार सूरज के घर लक्ष्मी पूजन था, जिसके लिए उसने सेठ और सेठानी को अपने घर आने का आमंत्रण दिया। सेठ और सेठानी ने भी सूरज का आमंत्रण स्वीकार कर लिया। यह पहली बार था जब वे अपने किसी नौकर के घर जाने के लिए तैयार हुए थे।
अगले दिन सेठ और सेठानी सूरज के घर आने के लिए निकले। सेठानी ने घर से निकलते वक्त अपने सारे गहने निकालकर बैग में रख लिए थे। दरअसल उन्हें रास्ते में चोर-उचक्कों का बड़ा डर रहता था, पता नहीं कौन कब आकर हाथ साफ कर जाए! इसलिए उन्होंने सतर्क रहते हुए अपने गहने बैग में रख लिए और जैसे ही वे सूरज के घर पहुँचने को हुए तो सारे गहने पहन भी लिए।
जब सेठ और सेठानी आए, तो उनका बहुत आदर-सत्कार के साथ स्वागत किया गया। सूरज और उसकी पत्नी रमा ने सेठ और सेठानी के आने की खुशी में अपने छोटे से घर को खूब सजाया हुआ था और साथ ही उनकी आवभगत के लिए स्वादिष्ट भोजन भी तैयार किया था।
कुछ देर बातचीत के बाद पूजा शुरू हुई। पूजा समाप्त होने के बाद सेठ और सेठानी को भोजन कराया गया। इसके बाद कुछ समय और बिताकर सेठ और सेठानी घर जाने के लिए निकल पड़े। सूरज भी उन्हें गाँव के बाहर तक छोड़ने उनके साथ गया।
घर से निकलते ही सेठानी अपने सारे गहने निकालकर वापस बैग में रखने लगीं। इसी बीच गलती से उनका एक कीमती कंगन जमीन पर गिर गया और सेठानी इस बात से बिल्कुल अनजान थीं।
सेठ और सेठानी को गाँव के बाहर तक छोड़ने के बाद, सूरज जब घर को लौट रहा था, तब रास्ते में उसकी नज़र जमीन पर पड़े एक चमचमाते सोने के कंगन पर पड़ी। सूरज ने वह कंगन उठाया और उसे ध्यान से देखा। वह कंगन बेहद कीमती लग रहा था। ये सेठानी का वही कंगन था जो कि बैग में रखते वक्त गिर गया था।
सूरज ने घर पहुँचकर अपनी पत्नी रमा को वह कंगन दिखाया। कंगन देखते ही रमा की आँखें चमक उठीं। वह कहने लगी- “यह तो बहुत कीमती लगता है। एक काम करते हैं, इसे बेच देते हैं। इसे बेचकर जो पैसे आएँगे उनसे हमारी कई जरूरतें पूरी हो सकती हैं।”
इस पर सूरज ने सख्ती से जवाब दिया- “नहीं रमा, यह कंगन हमारा नहीं है, इसीलिए इसे बेचने का हमें कोई हक नहीं है। यह जिस किसी का भी है, हमें उसे ढूँढकर उसको यह कंगन लौटा देना चाहिए।”
रमा ने चिढ़ते हुए कहा- “तुम्हारी यही ईमानदारी हमें सदा गरीब बनाए रखेगी। कोई और होता, तो अब तक इसे बेचकर ऐश कर रहा होता।”
अपनी पत्नी की इस बात पर सूरज ने कोई जवाब नहीं दिया। वह खामोश रहा। अगले दिन सूरज गाँव के घर-घर और बाज़ार में जाकर कंगन के मालिक का पता लगाने की कोशिश करने लगा। बहुत पूछताछ की लेकिन कुछ पता नहीं चला।
हरीश, जो कि सूरज का एक करीबी मित्र था, सूरज से कहने लगा- “सूरज, अगर यह कंगन गाँव के किसी व्यक्ति का होता, तो अब तक पता चल जाता। मुझे लगता है यह किसी बाहरी व्यक्ति का है। बेहतर होगा कि तुम इसे पुलिस को सौंप दो, वे इसके असली मालिक का पता लगा लेंगे।”
सूरज ने कहा- “नहीं हरीश, मुझे पुलिस पर भरोसा नहीं है। यदि उन्हें यह कंगन दे दिया तो वे लोग स्वयं इसे बेचकर अपनी जेब भर लेंगे। जब तक कंगन के असली मालिक का पता नहीं चल जाता, बेहतर यही है कि मैं इसे अपने पास ही रखूँ।”
इसके बाद कुछ दिन यूँ ही बीत गए। अब तक कंगन के असली मालिक का पता नहीं चल पाया था। फिर एक दिन किसी काम से सेठ रामनाथ ने सूरज को अपने घर बुलाया। जब सूरज वहाँ पहुँचा तो उसने ध्यान दिया कि सेठ रामनाथ आज बड़े उदास लग रहे है। उसने सेठ जी से इस उदासी कारण पूछा तो सेठ जी कहने लगे- “अरे, हमारी पत्नी का एक बेशकीमती कंगन कुछ दिनों से मिल नहीं रहा है। पता नहीं कहाँ गया! बहुत कीमती है वह कंगन।”
तब सूरज ने अपनी जेब में से कंगन निकालकर सेठ को दिखाया- “सेठ जी, कहीं वह बेशकीमती कंगन यह तो नहीं?”
“अरे यही तो है वह कंगन! सूरज, ये कंगन तेरे पास कैसे आया?” – सेठ रामनाथ ने हैरान होकर पूछा।
“सेठ जी, जिस दिन आप और सेठानी हमारे घर पूजा में आए थे। उसी दिन आपको गाँव के बाहर तक छोड़ने के बाद जब मैं घर वापस आ रहा था, तभी रास्ते में मुझे ये कंगन मिला था। तब से मैं इसके असली मालिक की तलाश कर रहा हूँ।”
सेठ रामनाथ ने कंगन पाकर राहत की साँस ली और कहा- “लगता है तुम्हारे घर से आते वक्त रास्ते में ये गिर गया था। सूरज, तुमने इसे संभालकर रखा, यह तुम्हारी ईमानदारी का प्रमाण है। अगर यह कंगन किसी और के हाथ लग जाता, तो शायद हमें कभी वापस नहीं मिलता। तुमने हमारी पत्नी का बेशकीमती कंगन लौटाकर हमारी बहुत मदद की है। आजकल तुम्हारे जैसे ईमानदार लोग बहुत कम देखने को मिलते हैं। तुम्हारी ईमानदारी के फलस्वरूप हम तुम्हारी पगार बढ़ा रहे हैं।”
सेठजी की यह बात सुनकर सूरज बहुत खुश हुआ। सेठानी ने भी अपनी तरफ से सूरज और उसकी पत्नी को बहुमूल्य तोहफे भेंट किए। जब सूरज घर लौटा, तो उसने सारी बात रमा को बताई। वह रमा से कहने लगा- “देखा रमा, तुम बार-बार कह रही थीं ना कि मुझे ये कंगन बेच देना चाहिए। तुम्हारी बात मानकर यदि मैंने कंगन बेच दिया होता तो हमें सेठानी से ये बहुमूल्य तोहफ़े नहीं मिल पाते और न ही मेरी तनख्वाह में बढ़ोतरी होती।”
यह सब सुनकर रमा शर्मिंदा हो गई। वह अपने पति से माफ़ी माँगने लगी। तब सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा- “रमा, परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, इंसान को मेहनत और ईमानदारी का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि मेहनत और ईमानदारी का फल इंसान को हमेशा मिलता है।”
रमा ने सिर झुकाकर कहा- “आप सही कह रहे हैं। मैं आपकी यह बात हमेशा याद रखूँगी।”












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