मातृभाषा की पहेली: तेनालीराम की चतुराई
यह कहानी “मातृभाषा की पहेली” तेनालीराम की चतुराई और मातृभाषा की महत्ता को दर्शाती है। जब विद्वान ने 15 भाषाएँ बोलीं, तब भी तेनालीराम ने सच्चाई पहचान ली।
राजा कृष्णदेवराय के दरबार में एक दिन एक दूरदेशी विद्वान पधारे। महाराज को प्रणाम करके उन्होंने कहा- “महाराज, मैंने दूर-दूर तक आपके दरबार की ख्याति सुनी है। सुना है कि आपके यहाँ एक से बढ़कर एक ज्ञानी और चतुर दरबारी हैं।”
महाराज मुस्कराए और बोले- “आपने बिल्कुल ठीक सुना है महाशय। हमारे दरबार में कई बुद्धिमान दरबारी उपस्थित हैं और हमें अपने दरबारियों की बुद्धिमत्ता पर गर्व है।”
विद्वान ने उत्सुक होकर कहा- “तो क्या आपके ये दरबारी मेरे एक प्रश्न का सही उत्तर दे सकते हैं?”
राजा ने पूरे आत्मविश्वास से कहा- “बिलकुल! हमारे दरबारी हर जटिल प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम हैं। आप बेहिचक पूछिए।”
विद्वान ने गहरी आवाज में पूछा- “ठीक है महाराज। मैं अनेक भाषाओं का ज्ञान रखता हूँ, इसलिए मैं अलग-अलग भाषा में बोलकर दिखाऊंगा। मुझे सुनने के बाद यदि आपके दरबार का कोई भी व्यक्ति मेरी मातृभाषा बतला सका तो मैं अपनी हार स्वीकार कर लूँगा। अन्यथा आपको ये मानना होगा कि आपके दरबार में एक भी बुद्धिमान व्यक्ति नहीं है।”
इतना कहकर विद्वान ने अलग-अलग भाषाओं में बोलना आरंभ किया- तेलुगू, तमिल, मराठी, पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम…इस तरह उन्होंने 15 से अधिक भाषायें बोलीं। वे हर भाषा में ऐसे बोलते कि सुनने वाले को लगे कि यही इनकी मातृभाषा है।
अब दरबारी एक-एक कर अलग-अलग भाषाओं का नाम लेने लगे, लेकिन विद्वान हर जवाब पर न में सिर हिला देते थे। निराश होकर सभी दरबारी एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। कोई कुछ कहने की स्थिति में नहीं था। सभी चुप थे।
महाराज ने चारों ओर देखा। सबके चेहरे लटक चुके थे। फिर उनकी नजर तेनालीराम पर पड़ी। उन्होंने तेनालीराम से पूछा- “तेनालीराम, क्या इस प्रश्न का तुम्हारे पास भी कोई जवाब नहीं है?”
तेनालीराम ने मुस्कराकर जवाब दिया- महाराज, ये महाशय कई भाषाओं में पारंगत हैं। ऐसे में इनकी मातृभाषा पहचान पाना थोड़ा कठिन जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप मुझे महाशय के साथ कुछ पल बिताने का अवसर दें, ताकि मैं इनके पश्न का उत्तर प्राप्त कर सकूं।
राजा ने अनुमति दे दी। विद्वान ने भी तेनालीराम के साथ समय के लिए हामी भर दी। अब तेनालीराम विद्वान जी के साथ राजमहल का भ्रमण करने निकले। रास्ते में वार्तालाप के दौरान विद्वान अलग-अलग भाषाओं में बात कर रहे थे।
चलते चलते दोनों वाटिका तक आ पहुंचें। फिर दोनों एक पेड़ के नीचे बैठकर वार्तालाप करने लगे। इसी बीच मौका पाकर तेनालीराम ने विद्वान के पाँव में काँटा चुभा दिया। विद्वान जी अचानक दर्द से छटपटाने लगे और तमिल भाषा में चिल्ला उठे — “उम्मा! उम्मा!”
तेनालीराम ने तुरंत विद्वान जी से क्षमा माँगी। इसके बाद विद्वान जी अतिथि कक्ष में विश्राम करने चले गये।
अगले दिन दरबार में महाराज ने तेनालीराम से प्रश्न किया- “हाँ तो बताओ तेनालीराम! क्या तुम्हें विद्वान के प्रश्न का उत्तर मिला?”
“जी महाराज, उत्तर मिल गया है। इन महाशय की मातृभाषा तमिल है।”
ये सुनते ही विद्वान चौंक उठे- “अरे! आपने बिलकुल सही बताया है। लेकिन आपको पता कैसे चला कि मेरी मातृभाषा तमिल है?”
इसपर तेनालीराम ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया- “महाशय, कल जब मैंने आपके पाँव में काँटा चुभाया था, तब आप तमिल में ‘उम्मा उम्मा’ पुकार रहे थे। बस तभी मैं यह जान गया था कि आपकी मातृभाषा तमिल है। किसी भी प्रकार की पीड़ा या कष्ट होने पर मनुष्य की मातृभाषा अपने आप उसकी जुबान पर आ जाती है और आपके साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ।”
यह सुन विद्वान जी गदगद हो गए। वे तेनालीराम से बोले- “आप धन्य हैं तेनालीराम! आप सच में विद्वान हैं और चतुराई व सूझबूझ के स्वामी हैं।”
महाराज भी अत्यंत प्रसन्न हुए- “वाह तेनालीराम, तुम्हारी बुद्धिमत्ता के आगे बड़े-बड़े पंडित भी नतमस्तक हैं।”
और इस तरह एक बार फिर, तेनालीराम ने अपनी चतुराई से दरबार का मान बढ़ाया।












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