सूर्यकांत त्रिपाठी की कविता – अट नहीं रही है
“अट नहीं रही है” सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रसिद्ध फागुन कविता है, जिसमें ऋतु की आभा, रंग और सुगंध का गहन चित्रण किया गया है। पढ़ें विस्तार से।
अट नहीं रही है
आभा फागुन की तन
सट नहीं रही है।
कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।
पत्तों से लदी दाल,
कहीं हरी, कहीं लाल,
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल,
पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है।
इस सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता में कवि ने फागुन मास की सुंदरता और मादकता को दर्शाया है, जो तन-मन को पूरी तरह घेर लेती है। इसकी खुशबू, रंग और सौंदर्य इतने गहरे हैं कि आँखें हटाने पर भी वह मन से नहीं हटती।












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