लालच बुरी बला है – प्रेरक और शिक्षाप्रद कहानी

लालच बुरी बला है कहानी हमें सिखाती है कि अधिक पाने की चाहत अक्सर नुकसान पहुँचा सकती है। यह बच्चों और बड़ों दोनों के लिए एक प्रेरक सीख है।

एक गाँव में रामलाल नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत मेहनती और ईमानदार था। खेत में काम करके जितना अनाज मिलता, उतने में ही अपने परिवार का पालन-पोषण कर लेता। उसकी यह सादगी देखकर गाँव के लोग उसकी बहुत इज़्ज़त करते थे।

लेकिन रामलाल का एक पड़ोसी हरिश्चंद्र था, जो लालची स्वभाव का था। उसे हमेशा दूसरों की चीज़ें देखकर लालच आ जाता। एक दिन उसने देखा कि रामलाल के खेत में इस बार बहुत अच्छी फसल हुई है। वह मन ही मन सोचने लगा – “काश, यह पूरा खेत मेरा होता तो मैं खूब धन कमा लेता।”

कुछ दिनों बाद गाँव में एक साधु महाराज आए। उन्होंने घोषणा की कि “जो व्यक्ति सूरज उगने से लेकर डूबने तक जितनी ज़मीन नाप लेगा, वह सारी ज़मीन उसकी हो जाएगी। लेकिन एक शर्त है – सूरज डूबने से पहले उसे वहीं लौटकर आना होगा, जहाँ से उसने शुरुआत की थी। यदि वह समय पर वापस न आ सका, तो सारी ज़मीन छिन जाएगी।”

यह सुनकर हरिश्चंद्र बहुत उत्साहित हो गया। उसने सोचा कि अब तो वह गाँव का सबसे बड़ा ज़मींदार बन जाएगा। अगले दिन वह तड़के ही नापना शुरू कर दिया। चलते-चलते वह सोचता – “बस थोड़ी और ज़मीन ले लूँ… थोड़ी और…” और इसी लालच में वह बहुत दूर तक चला गया।

शाम होते-होते उसे अहसास हुआ कि सूरज डूबने वाला है और उसे जल्दी वापस लौटना होगा। वह भागता-भागता लौटने लगा, लेकिन थकान और भूख से उसका शरीर जवाब देने लगा। जैसे ही सूरज डूबा, वह गिर पड़ा और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।

गाँव के लोग कहने लगे –
“लालच आदमी को अंधा बना देता है। जितना है उसी में संतोष करना ही सच्चा सुख है।”

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