रेहलत
“रेहलत” एक भावनात्मक यात्रा है, जो उम्र भर साथ बिताने वाले दो आत्माओं के अंतिम बिछड़ाव की पीड़ा को शब्दों में समेटती है। यह कविता प्रेम, वियोग, और मृत्यु के अनिवार्य सत्य को बेहद कोमलता और गहराई से दर्शाती है।
यह कविता “रेहलत” (जिसका अर्थ है विदाई या बिछड़ना) एक बेहद भावुक और गहन रचना है — प्रेम, जीवन और मृत्यु के बीच के उस अंतिम संवाद को शब्द देती है जो हर इंसान के दिल को छू जाता है।
उम्र भर हम साथ इक घर में रहे है,
एक दिन तो बिछड़ना हमको पड़ेगा।
मौत मुझको आएगी जो साथ लेने,
हाथ मेरा छोड़ना तुझको पड़ेगा।
हम पड़े बिस्तर पे बेसुध खाक होकर,
तुम खड़े हो साथ फिर भी जान मेरे,
सोचते हो रोक लोगे मौत को तुम,
तोड़ बंधन, मौत संग जाना पड़ेगा।
यादें सारी धुंधली होने लगी है,
वक्त अब जल्दी गुजरने भी लगा है,
चाह कर भी वक्त ना अब ये रुकेगा,
दूसरे घर,छोड़ अब जाना पड़ेगा।
उम्र भर हम साथ इक घर में रहे है,
एक दिन तो बिछड़ना हमको पड़ेगा।
मौत मुझको आएगी जो साथ लेने,
हाथ मेरा छोड़ना तुझको पड़ेगा।
खूबसूरत वो बड़ी बीती है शामें,
हैं जहां बीती जवानी की गिलासें,
शाम वो बीत गई वापस न आई,
दौर इससे गुजरना सबको पड़ेगा।
वक्त हमने साथ है काफ़ी बिताया,
वक्त अब है कुछ पलों का साथ बाकी,
प्यार की है कसम तुमको सनम मेरे,
रेहलत मुझको तुझे करना पड़ेगा।
उम्र भर हम साथ इक घर में रहे है,
एक दिन तो बिछड़ना हमको पड़ेगा।
मौत मुझको आएगी जो साथ लेने,
हाथ मेरा छोड़ना तुझको पड़ेगा।
पंकज कुमार (सफ़र) (बीकानेर, राजस्थान)
द्वारा प्राप्त हुई है।












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