हिन्दी भाषा: माँ की तरह अनुपम और अद्वितीय
इस कविता में हिन्दी भाषा की महिमा को बयां किया गया है। हिन्दी को मां जैसी ममता और सन्मान दिया गया है।
हिन्दी है माथे की बिंदी,
इसके बिन जग सूना है!
जब इसका सम्मान करें सब,
मन हर्षाए दूना है!!
इसकी ऊँची शान हमेशा,
कोई और न भाषा ऐसी है!
अन्य सभी हैं मौसी जैसी,
यही मेरी माँ जैसी है!!!!
कोई गिला नहीं औरों से,
हिंदी की कुछ बात और है!!!
“जय हिन्दी जय हिन्दुस्तान”….
सर्वत्र गूँजता यही शोर है,
सर्वत्र गूँजता यही शोर है !!
यह कविता सिर्फ पंक्तियाँ नहीं, बल्कि हमारे दिल की आवाज़ है।
“हिन्दी है माथे की बिंदी, इसके बिन जग सूना है” – इन शब्दों में वही अपनापन है जो हमें हर बार अपनी हिन्दी भाषा से मिलता है।
कविता की आख़िरी पंक्ति –
“अन्य सभी हैं मौसी जैसी, यही मेरी माँ जैसी है”
सीधे दिल को छू जाती है। यही तो सच है, और कोई भाषा हमें इतनी आत्मीय नहीं लगती जितनी हमारी मातृभाषा हिन्दी।
हिन्दी दिवस पर इस कविता को पढ़ना हमें याद दिलाता है कि भाषा सिर्फ बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान है। आज भी जब हम “जय हिन्दी, जय हिन्दुस्तान” बोलते हैं, तो दिल में एक अलग ही गर्व और जोश उमड़ता है।
तो इस हिन्दी दिवस पर क्यों न हम सब मिलकर यही संदेश फैलाएँ –
हिन्दी है हमारी माँ, इसका सम्मान ही हमारा मान है।












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