डॉक्टर अंशुल की अनकही दास्तान
बचपन में माँ को खोने का ग़म, और उसी ग़म को जीवन का लक्ष्य बना लेने की कहानी – डॉक्टर अंशुल की अनकही दास्तान, जो हर दिल को छू जाती है।
डॉक्टर अंशुल के दिन की शुरुआत हमेशा की तरह तनावपूर्ण रही। उनके कैबिन में मरीजों की रिपोर्ट की फाइलों का एक विशाल ढेर लगा हुआ था और वे उनमें से ही एक रिपोर्ट को पढ़ने में व्यस्त थे। अचानक, एक नर्स ने उनके कमरे का दरवाजा खटखटाया और कहा- “डॉक्टर साहब जल्दी चलिए, एक बहुत ही गंभीर मामला आया है।”
डॉ. अंशुल फौरन उठे और इमरजेंसी रूम की ओर भागे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि एक महिला स्ट्रेचर पर लेटी हुई थी। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था। साँसें बहुत तेज चल रही थीं और आँखों में बेबसी का साया था। डॉ. अंशुल ने महिला की हालत देखकर तुरंत इलाज शुरू किया। वह पूरी लगन से उस महिला की जान बचाने की कोशिश कर रहे थे। कई घंटों के अथक प्रयासों के बाद, आखिरकार उस महिला की स्थिति में सुधार आया। उसकी साँसें अब सामान्य हो चुकी थीं। डॉ. अंशुल ने भी राहत की साँस ली। पास ही खड़ी नर्स ने कहा- “डॉक्टर साहब, आपने इस महिला की जान बचा ली।”
डाॅक्टर मुस्कुराए, लेकिन कुछ कहा नहीं। उनकी आँखों में हल्की-सी नमी थी। वह वापस अपने कैबिन लौटे, दरवाजा बंद किया और जाकर अपने डेस्क पर बैठ गए। फिर उन्होंने अपने पर्स से एक पुरानी फोटो निकाली। वह फोटो उनकी माँ की थी जो कई साल पहले दुनिया छोड़कर चली गई थीं। उनकी आँखों में आँसू थे। ये आँसू उस दर्द की याद दिला रहे थे जो उन्हें सालों पहले मिला था।
दरअसल बात उस समय की है जब डाॅ. अंशुल अपने बालपन में थे। उनकी माँ को अस्थमा की गंभीर बीमारी थी। माँ का इलाज भी चल रहा था लेकिन तबियत में कोई खास सुधार नहीं था। फिर एक दिन अचानक माँ की तबियत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। वह जोर-जोर से हाँफने लगीं।
अंशुल तब बहुत छोटे थे। अपनी माँ की बिगड़ती हालत देखकर उन्होंने तुरंत डॉक्टर को फोन लगाया, फिर पिताजी को भी खबर की…लेकिन जब तक डॉक्टर घर पहुँचे तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक माँ ने अपने बेटे की आँखों के सामने दम तोड़ दिया। अंशुल के लिए वह पल किसी बुरे सपने से कम नहीं था। अपनी माँ को यूँ खोना, उनकी नन्हीं आँखों में ऐसा दर्द और बेबसी छोड़ गया था जिसे शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है।
उसी दिन अंशुल ने मन ही मन ठान लिया था कि वह बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा। वो हर उस माँ का इलाज करेगा जो बीमारी से लड़ रही होगी। हर उस माँ की जान बचाने की कोशिश करेगा, जिसकी सलामती के लिए उसका बच्चा बेचैनी से प्रार्थना कर रहा होगा। जो दर्द उसने अपनी माँ को खोकर सहा है, वो दर्द वह किसी और बच्चे को महसूस नहीं होने देगा।
आज, जब डाॅ. अंशुल उस महिला की जान बचा रहे थे। तब उनकी आँखों में वही डर था जो अपनी माँ को खोते समय उन्हें महसूस हुआ था। उस महिला की जान तो उन्होंने बचा ली थी। लेकिन उन्हें अफसोस इस बात का था कि वे अपनी माँ को नहीं बचा पाए! काश उस समय वे डाॅक्टर रहे होते तो शायद उनकी माँ आज जिंदा होती। ये सोचते ही उनकी आँखों से अश्रु की धारा बहने लगी।
खैर, डाॅ. अंशुल के इस दर्द को समझ पाना आपके और मेरे लिए इतना आसान नहीं है…












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