संघर्ष की राह: मेहनत से मिली सफलता की प्रेरणा
संघर्ष की राह एक गरीब किसान के बेटे अविनाश की कहानी है, जो मुश्किल हालातों में भी डटा रहा और अपनी मेहनत से इंजीनियर बनकर अपने गाँव का नाम रोशन किया।
शिवपुर गाँव के एक बहुत ही छोटे से घर में रहने वाला अविनाश बचपन से ही पढ़ाई में बहुत जिज्ञासु और मेहनती था। उसके पिता रघुनाथ एक साधारण किसान थे, जो दिन-रात मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। अविनाश के घर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन पढ़ाई के प्रति उसका जुनून देखते ही बनता था। जब उसके दोस्त खेल-कूद में व्यस्त होते थे, तब वह किताबों में खोया रहता था।
बारहवीं की परीक्षा में अविनाश ने गाँव में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए। स्कूल के प्रधानाचार्य ने भी उसकी तारीफ की और कहा- “अविनाश, तुम्हें आगे की पढ़ाई जरूर करनी चाहिए। तुममें बहुत प्रतिभा है।”
लेकिन जब घर पर इस बारे में बात हुई, तो पिता ने सिर झुका लिया और कहा- “बेटा, मैं तेरी हिम्मत तोड़ना नहीं चाहता, लेकिन हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि तुझे आगे पढ़ा सकें। तेरा बड़ा भाई खेती करने में मेरा हाथ बंटा रहा है, और तेरी माँ की तबीयत भी ठीक नहीं रहती। हम बस उतना ही जोड़ पाते हैं, जिससे घर का गुजारा चल सके। ऐसे में तेरी पढ़ाई का खर्चा हम किस तरह पूरा कर पायेंगे बेटा!”
अविनाश अपने पिता की बात सुनकर उदास जरूर था। लेकिन हार मान लेना शायद उसकी फितरत में ही नहीं था। अविनाश ने गाँव की एक किताबों की दुकान में काम करना शुरू कर दिया। दिनभर वह दुकान में बैठकर काम किया करता और शाम को अपने पुराने नोट्स से पढ़ाई करता। रात को, जब घर में अंधेरा हो जाता, तब वह गाँव की स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई करता।
गाँव के लोग अक्सर उसे देखकर उसका मज़ाक उड़ाते थे और कहते थे- “अरे अविनाश, बेकार मेहनत क्यों कर रहा है? इससे कुछ नहीं मिलेगा। किसान का बेटा है तू, आखिरकार तुझे खेतों में हल ही चलाना है।”
अविनाश गाँववालों की बातों का कभी कोई जवाब नहीं देता था। वह उनकी बातों को नज़रअंदाज करके दोबारा अपनी पढ़ाई में लग जाता था। एक दिन उसकी माँ ने उसे यूँ ही रात में पढ़ते देखा। वह उसके पास आई और प्यार से उसका सिर सहलाते हुए बोली- “बेटा, इतनी मेहनत क्यों कर रहा है? दिन में काम करके पैसा भी जोड़ रहा है और रात में ये सब…अपनी सेहत का भी तो ख्याल रख बेटा।”
अविनाश ने माँ की ओर देखा और कहा- “माँ, जब तक मैं तुम्हारे रहने के लिए एक अच्छा घर नहीं बना देता, तब तक मैं हिम्मत नहीं हारूँगा। देखना माँ, मैं पढ़ूँगा और कुछ बड़ा बनकर दिखाऊँगा।”
बेटे की ये बातें सुनकर माँ की आँखें भर आईं। उसने अपने बच्चे को गले से लगा लिया। मानो उसे विजय होने का आशीर्वाद दे रही हो।
इसी तरह अविनाश लगातार मेहनत किए जा रहा था…और आखिरकार अविनाश की मेहनत रंग लाई। उसने इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास कर ली और उसे एक अच्छे कॉलेज में दाखिला भी मिल गया। लेकिन अब अविनाश के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई। कॉलेज की फीस और शहर में रहने का खर्चा कैसे हो?
छात्रवृत्ति के चलते कॉलेज की फीस तो निकल जाती। पर अब शहर में रहने-खाने का खर्चा कैसे निकाला जाए…ये समस्या अब भी बनी हुई थी। इसी बात को लेकर अविनाश ने अपने स्कूल के प्रधानाचार्य से बात की। इस पर उन्होंने कहा- “अविनाश, शहर में मेरा एक दोस्त है जो ट्यूशन क्लासेस चलाता है। उसका घर भी तुम्हारे कॉलेज से ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन अब उसके पास खुद का एक बिजनेस है, जिसके चलते वो ट्यूशन क्लास के लिए समय नहीं निकाल पाता। इसलिए वह ऐसे किसी योग्य व्यक्ति की तलाश में है जो उसके यहाँ बच्चों को ट्यूशन पढ़ा सके…मेरे ख्याल से तुम इस काम के लिए योग्य हो। यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो मैं अपने दोस्त से बात करूँ।”
बस फिर क्या था, अविनाश ने तुरंत हामी भर दी। अब अविनाश शहर में रहकर अपनी कॉलेज की पढ़ाई भी कर रहा था और साथ ही कॉलेज खत्म हो जाने के बाद 4 घंटे ट्यूशन भी पढ़ाता था। धीरे-धीरे कुछ पैसे जोड़कर उसने एक नई साइकिल भी खरीद ली। इससे उसका कॉलेज जाने और ट्यूशन जाने के लिए जो किराया लगता था वो भी बचने लगा।
अविनाश के मामा जी उसी शहर में अख़बार बाँटने का काम किया करते थे। लेकिन अब वो इस काम को छोड़ रहे थे। वे चाहते थे कि उनकी जगह अविनाश इस काम को करने लगे। इससे उसकी आमदनी में और इजाफा हो पाएगा। जब उन्होंने अविनाश से इस बारे में बात की तो वह तुरंत राजी हो गया…
अब अविनाश रोजाना सुबह-सुबह अपनी साइकिल से अख़बार बाँटता, दोपहर में कॉलेज जाता और शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता। इस दिनभर की भागदौड़ से कई बार वह इतना थक जाता था कि सोचता कि यह सब छोड़ दे, लेकिन जब भी वह अपने माता-पिता की चिंता और उम्मीद से भरी आँखों को याद करता, उसकी हिम्मत फिर से बढ़ जाती।
इसी तरह अविनाश पूरी लगन से अपना कार्य करता जा रहा था। कॉलेज के आखिरी साल में उसे एक बड़ी कंपनी में इंटरव्यू देने का मौका मिला। इंटरव्यू में पूछे गए सभी सवालों का अविनाश ने ठीक तरह से और बड़ी ईमानदारी से जवाब दिया।
पैनल में बैठे लोग उसकी ईमानदारी से प्रभावित हुए…और कुछ दिन बाद अविनाश को कंपनी की ओर से चयन पत्र भी मिल गया। उसने सबसे पहले अपने पिता को फोन करके यह खुशखबर सुनाई। खबर सुनकर पिता की आँखों में आँसू आ गए। अविनाश का पूरा परिवार आज उसके लिए बहुत प्रसन्न था।
कुछ समय बाद, वही अविनाश जो कभी स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ता था, अब एक सफल इंजीनियर बन चुका था। उसने अपने गाँव में गरीब बच्चों के लिए एक नया पुस्तकालय भी खोला जहाँ बच्चे मुफ़्त में पढ़ाई कर सकें। आज गाँव के वह लोग जो कभी उसकी मेहनत का मजाक उड़ाया करते थे, अब उसकी तारीफ कर रहे थे।
अविनाश की यह कहानी हमें यह बताती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, मेहनत और धैर्य से हर मंजिल पाई जा सकती है। संघर्ष की राह आसान नहीं होती, लेकिन उसी राह पर चलकर असली सफलता प्राप्त होती है।












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