“दहेज़”(सामाजिक कुरीतियां पर एक कहानी)

यह कहानी दहेज जैसी सामाजिक बुराई पर गहरा प्रहार करती है। कामना नाम की लड़की अपने ससुराल वालों को उनके लालच का सच्चा अर्थ सिखाती है।

कामना दहेज के खिलाफ खड़ी एक साहसी लड़की

कामना एक गरीब घर से थी। उसके पिता मोहनदास एक किसान थे और खेती करके अपना जीवन चलाते , इसके साथ अपनी बेटी को पढ़ाया – लिखाया। गरीब होने के कारण कामना स्नातक तक ही पढ़ पाई , उसके आगे की पढ़ाई के लिए उसके पिता के पास पैसे नहीं थे।
कामना की मां लक्ष्मी चाहती थी कि कामना की शादी किसी शहर के अच्छे घर में हो जाए ताकि उसका जीवन अच्छा बीत जाए। अगर उसके ससुराल से कोई मदद हो तो कामना अपनी आगे की पढ़ाई कर सकती थी।

कामना की उम्र इक्कीस साल थी , सूरत से सुंदर और संस्कारों में सुंदरता और भी ज्यादा छलकती थी। मोहनदास को किसी बिचौलिए से पता लगा की शहर में एक परिवार हैं जिनके सिर्फ एक बेटा हैं जो एक अच्छी नौकरी करता हैं। मोहनदास को लगा कामना के लिए ये परिवार अच्छा होगा। छोटा परिवार हैं तो खर्चे भी छोटे और दहेज भी कम देना पड़ेगा।

बात आगे बढ़ी ,जुमल और कामना की शादी तय हो गई। मोहनदास ने जितनी उम्मीद की थी उससे भी ज्यादा दहेज जुमल के परिवार वालों ने मांगा। कामना ने अपने पिता को दहेज देने से मना भी किया लेकिन उन्होंने ने कामना की खुशी देखते हुए दहेज भी दे दिया। कामना के मन में दहेज की ही बात घूम रही थी , जो उसके पिता ने आधी जमीन बेच कर दिया था।

जुमल इस बात से खुश था कि उसे बहुत बड़ा दहेज मिला हैं। जुमल के पिता धनराज और मां कामी भी दहेज ले कर बहुत खुश थे। शादी के बाद जुमल ने कामना को आगे पढ़ने से भी मना कर दिया। जुमल का मानना था कि अगर कामना पढ़ेगी तो घर में उसकी मां को कौन सहारा देगा। कामना के शुरू के कुछ दिन दर्द में ही बीते। कामना ने अपने माता पिता को भी इसके बारे में बताया तो उन्होंने भी कामना को चुप रहने को कहा।

कामना पढ़ी लिखी थी तो जानती थी अगर उसने जुमल को अपने ऊपर हावी होने दिया तो उसका जीना और भी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए कामना ने भी जुमल और उसके परिवार को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया।

कामना अपने ससुराल में जब दुबारा पहुंचती हैं तो कामी ने उसे घर के बाहर ही रोक दिया।

कामी ने भारी आवाज में पूछा,”इतने दिन कोई अपने मायके में रहता हैं क्या! तुम्हारा घर वो नही अब ये हैं। वो तुम्हारे माता पिता नहीं अब हम हैं।”

कामी की आवाज डराने वाली थी लेकिन कामना भी सामना करने के लिए तैयार थी।

कामना ने भी जवाब में कहा,”अगर आप मां बाप होते तो मुझे ऐसे दरवाजे पर ही रोक कर सवाल नहीं पूछते।”

कामी ने ऊंची आवाज करते हुए कहा,“मेरे सामने बोलती हो। हमनें सोचा कोई संस्कारी लड़की होगी गांव की ,लेकिन तुम तो अपनी सास की भी इज्जत नहीं करती।”

कामना ने तुरंत जवाब दिया,“गांव की हूं , संस्कारी भी हूं। लेकिन आपके घर आने के बाद मेरे संस्कार भी खत्म हो गए।”

कामी कामना की तरफ देखती रहती हैं। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके सामने जो खड़ी हैं वह उसकी बहू हैं , जिसे कुछ दिन पहले वह दबा कर रखती थी।
कामना कामी को पीछे धक्का दे कर अपना बैग ले कर अंदर चली जाती हैं।

शाम के समय जब जुमल घर आया तो देखा कई सोफे पर उदास बैठी हैं।

जुमल ने कामी से पूछा,”क्या हुआ मां तुम उदास क्यों बैठी हो।”

कामी ने उदासी के स्वर में कहा,”क्या करूं ,मेरी कोई इज़्ज़त ही नहीं रही।”

“क्या हुआ मां? तुम ऐसा क्यों कह रही हो!”

“कामना के दिमाग पर पता नहीं कौन सा भूत सवार हो गया हैं। जब से आई हैं सबको बुरा भला बोले जा रही हैं।”

जुमल ने तुरंत कामना को आवाज लगाई। कामना अपने कमरे से बाहर आई और जुमल को गुस्से में देखा। कामना समझ गई कि कामी ने जुमल को सब कुछ बता दिया और कुछ दो चार अपनी तरफ से जोड़ कर भी बता दिया।

जुमल ने कहा,”कामना ये मैं क्या सुन रहा हूं। तुमने मां से गलत तरीके से बात की।”

कामना ने बेपरवाही से जवाब दिया,”हां, तो इसमें इतना गुस्से वाली क्या बात हैं।”

“ये घर मेरा हैं। यहां वही होगा जो हम लोग चाहेंगे , वो नहीं जो तुम चाहो।”

“जितना ये घर आपका हैं उतना मेरा भी हैं। यहां लगी हर चीज मेरे पापा ने दहेज में दी हैं।”

तो क्या हम लोग नौकर हैं।”

“काम तो सबको करना पड़ेगा। दहेज भी तो आप सभी ने मुंह खोल कर लिया था , तो काम भी दिल खोल कर करना होगा।”

“मैं तुम्हें घर से निकाल भी सकता हूं। तुम सड़क पर ठोकरें खाओगी।”

“मैं यहां से कहीं भी नहीं जाने वाली। दहेज लिया है तो उसकी कीमत चुकानी होगी।”

कामना अपने कमरे में चली जाती हैं। जुमल और कामी एक दूसरे की तरफ देखते हैं। कामी अपने माथे पर जोर से हाथ मारती हैं। वास्तव में कामी दहेज ले कर पछता रही थी। लेकिन वह कामना के सामने झुकना भी नही चाहती थी।

रविवार का दिन – जुमल चादर तान कमरे में शांति से सोया हुआ था। कामना पानी की बाल्टी भर लाई और एक ही छपके में जुमल के ऊपर डाल दी। ठंडा पानी गिरते ही जुमल आचनक से उठा और सामने कामना को देखा।

जुमल ने आंखे रगड़ते हुए कहा,”आज तो रविवार हैं।”

कामना ने कहा,”लेकिन घर का काम पड़ा हैं ,चलो जल्दी नीचे आ जाओ।”

कामना नीचे चली जाती हैं। जुमल अपने मन में ही कामना को गालियां देता हुआ सोच रहा था कि मैंने पता नहीं कौनसी मनहूस घड़ी में दहेज ले लिया था। जितना दहेज नहीं मिला उससे ज्यादा तो खून पसीना निकाल लिए इसने।
जुमल बिस्तर से उठा और आलस के साथ कमरे से बाहर आया।

घर के आंगन में कामी पोंछा लगा रही थी। सेठ धनराज जिनकी बाहर ज्यादा इज्ज़त इसलिए थी कि उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चे को अच्छे से संभाला था लेकिन आज वही अपने घमंड के कारण घर की सफाई में लगे थे। कामना सोफे पर आराम से बैठी केला खाते हुआ सभी को देख रही थी।

जुमल को देखते ही कामना खड़ी हुई और कहा,”आप रसोई संभालो।”

जुमल ने चौंकते हुए पूछा,”मैं!”

“हां आप। अगर हम औरतें रसोई और घर का काम कर सकती हैं तो आप मर्द क्यों नहीं।”

जुमल अब और आगे क्या बोलता। अपनी पत्नी की बात मान रसोई में चला जाता हैं। इतने में कामी पोंछा लगा कर सोफे पर बैठ जाती हैं।

कामना की नज़र पड़ते ही कामी सोफे से उठ जाती हैं। मानो जैसे कामना के सामने वह बस एक नौकरानी हो जिसे आराम ना करने की सख्त हिदायत हैं। कामी भी रसोई की तरफ चली जाती हैं।

जुमल रसोई में आ कर ऐसा महसूस कर रहा था जैसे वह किसी ऐसी दुनियां में आ गया हो जहां वह बाहरी अंतरिक्ष से आए किसी जीव के जैसा हो।

कामी ने जुमल से कहा,”जुमल बेटा मैं थक गई हूं थोड़ी चाय तो बना दे।”

जुमल ने दर्द भरी आवाज में कहा,”मां ये दहेज तो महंगा पड़ गया।”

“हां वो तो हैं। अब गुलामी के सिवाय कर भी क्या सकते हैं। सुबह से तीन बार पोंछा लगा चुकी हूं लेकिन उसे पता नहीं कहां से कोई मिट्टी का कण दिख जाता हैं।”

धनराज ने अंदर आते हुए कहा,”मुझे आज पता चला ये काम करना तो बहुत मुश्किल हैं। इससे अच्छा होता मैं आ बाहर ही चला जाता।”

कामी ने चटकारते हुए कहा,”मैं तो रोज कहती थी कोई नौकरानी रख लो मुझसे ये काम नहीं होता। आप ही कहते थे इस काम में क्या मुश्किल हैं। आज पता चला।”

“औरतों का काम ही यही होता हैं। इसलिए मैं इसे आसान कहता था।”

“अपनी गलती नही मानते। हमेशा मेरी ही गलती निकालते हो।”

गलती तो तुम्हारी ही होती हैं। मैं कोई गलती नहीं करता।”

“हां हां आप तो हरिश्चंद्र की औलाद हो। आप गलती क्यों करेगें। मेरे तो चेहरे पर ही गलती लिखा हैं।”

“उसमें बताने वाली क्या बात हैं। लिखा हैं तो दिखा हैं।”

“आप तो दूध के धुले हो , सारा दिन दुकान पर काम के बजाए ताश ही खेलते हो। मुझे पता हैं घर कैसे चलता है।”

जुमल इस फसाद से परेशान हो कर कहता हैं,”आप दोनो लड़ना बंद करो। ये सोचो कामना से कैसे पीछा छुड़ाएं। पिशाच की तरह वह तो पीछे ही पड़ गईं हैं।”

किसी के दिमाग में कोई तदबीर नहीं आ रही थी। सभी एक दूर एक मुंह की तरफ देख रहे थे। सोच रहे थे क्या पूरी जिंदगी ऐसे ही गुजारनी पड़ेगी। सच तो यही लग रहा था अभी के हालात देख कर।
इतने में बाहर कामना के साथ किसी और की आवाज रसोई में खड़े सभी के कानों में पड़ी। सभी एक साथ बहार आंगन में आते हैं।

मोहनदास का ध्यान धनराज , कामी और जुमल कि तरफ जाता हैं। मोहनदास को यकीन नही हो रहा था उनके सामने जो खड़े है वह उनके रिश्तेदार है। बुरा बदन पसीने से भरा , थका हुआ और चेहरे पर उदासी ,ऐसा लगा मानो मोहनदास ने अपनी बेटी का ब्याह किसी नौकरों के परिवार में कर दिया हो।

मोहनदास ने धनराज से पूछा,”आप इस हालत में!”

तीनों ने अपनी गर्दन नीचे झुका ली और कोई जवाब नहीं दिया।

कामना सामने आती है और कहती है ,”इनकी ये हालत मेरी वजह से हुई हैं। मैं इनको सबक देना चाहती थी। वैसे भी इन्होंने दहेज भी बहुत लिया हैं मैने सोचा वो भी वसूल हो जाएगा।”

धनराज ने हाथ जोड़ते हुए कहा,”हमें माफ कर दो। हमें हमारी गलती का अहसास हो गया। हम समझ गए दहेज की भी कीमत चुकानी पड़ती हैं और वो भी खून पसीना बहा कर।”

✍️ यह रचना हमें
पंकज कुमार (सफ़र) (बीकानेर, राजस्थान)
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