तेनालीराम की राजा को सीख
इस प्रेरणादायक कहानी में जानिए कैसे तेनालीराम ने राजा कृष्णदेव राय को सिखाया कि असली राजधर्म प्रजा की रक्षा और सुख-शांति में है, न कि बोझ डालने में।
एक बार राजा कृष्णदेव राय के दरबार में अरब से एक व्यापारी आया। वह अपने साथ कई शानदार अरबी घोड़े लाया था। उसने उनकी इतनी तारीफ की कि राजा तुरंत उन्हें खरीदने को तैयार हो गए। अच्छी कीमत देकर सभी घोड़े खरीद लिए गए। इतने सारे अच्छी नस्ल के घोड़े पाकर राजा बहुत खुश थे। लेकिन समस्या ये थी कि घोड़ों को रखा कहाँ जाए? सारे अस्तबल पहले से ही भरे हुए थे। उनमें नए घोड़ों को रखने की जगह ही नहीं थी।
तब राजगुरु ने एक उपाय सुझाया- “महाराज, जब तक घोड़ों को रखने के लिए एक नया अस्तबल बनकर तैयार नहीं हो जाता, तब तक क्यों न ये घोड़े मंत्रियों, दरबारियों और प्रजा में वितरित कर दिए जायें। सभी को प्रति महीने कुछ स्वर्ण मुद्रायें दी जायेंगी ताकि वे घोड़ों की अच्छी तरह से देखभाल कर सकें, फिर अस्तबल तैयार होते ही घोड़े वापस ले लेंगे।”
राजा को यह बात उचित लगी और उन्होंने तुरंत आदेश दे दिया। उनके आदेशानुसार एक-एक घोड़ा सभी मंत्रियों और दरबारियों को दे दिया गया। तेनालीराम को भी एक घोड़ा मिला। जो घोड़े बच गये, उन्हें प्रजा में वितरित कर दिया गया।
सभी ने घोड़े तो ले लिये थे लेकिन समस्या ये थी कि घोड़ों की देखभाल के लिये मिली राशि बहुत कम थी और इतनी कम राशी में घोड़े के लिए प्रतिदिन चारे का प्रबंध कर पाना असंभव था। लेकिन वे राजसी घोड़े थे इसलिए देखभाल में कोई कोताही भी नहीं बरती जा सकती थी। यदि घोड़े की ठीक तरह से देखभाल नहीं की तो राजा दंडित करेंगे, इस बात से भयभीत होकर प्रजाजन अपना पेट काटकर घोड़े को उत्तम चारा खिलाने लगे।
उधर तेनालीराम ने अपने घोड़े को लाकर एक अंधेरे कमरे में बाँध दिया। उस कमरे में एक छोटी-सी खिड़की थी। उस खिड़की से तेनालीराम हर शाम थोड़ी-सी सूखी घास घोड़े को खिलाया करते थे। घोड़ा दिन भर भूखा रहता था, इसलिए जैसे ही शाम को वह खिड़की से सूखी घास देखता, लपककर उसे खा जाता था।
इसी तरह दिन बीतते गये। कुछ महीने बाद नया अस्तबल बनकर तैयार हो गया। आदेशानुसार सभी लोग घोड़े लेकर राजमहल आ गये। सभी के घोड़े बड़े ही स्वस्थ लग रहे थे, लेकिन तेनालीराम का घोड़ा कहीं नजर नहीं आ रहा था। यह देखकर राजा ने तेनालीराम से पूछा- “तेनालीराम, तुम्हारा घोड़ा कहाँ है?”
तेनालीराम बोले- “क्या बताऊं महाराज! मेरा घोड़ा बहुत खूंखार हो गया है। वह किसी पर भी झपट पड़ता है। जब मैं उसे लेने गया तो उसने मुझपर भी हमला किया, इसलिए मैं उसे यहाँ नहीं ला सका महाराज।”
तेनालीराम की बात सुनते ही राजगुरु बोल पड़े- “महाराज, मुझे तेनालीराम की बात पर भरोसा नहीं है। घोड़ा सही-सलामत नहीं है, इसलिए तेनालीराम बहाना कर रहा है। हमें वहाँ जाकर वास्तविकता का पता लगाना चाहिए।”
महाराज ने राजगुरु की बात को ध्यान में रखते हुए उन्हें कुछ सैनिकों और तेनालीराम के साथ जाकर घोड़ा लाने का आदेश दिया।
जब राजगुरु तेनालीराम के घर पहुँचे तो तेनालीराम ने उन्हें कमरा दिखाते हुए कहा- “राजगुरू जी, इसी कमरे में है घोड़ा। जरा संभलकर, वह कभी भी हमला कर देता है। एक काम कीजिए राजगुरु, उसे पकड़ने से पहले आप खिड़की से अच्छी तरह मुआयना कर लीजिए।”
राजगुरु को भी लगा कि पहले खिड़की से ही मुआइना कर लेना चाहिए। राजगुरू की दाढ़ी काफी लंबी थी। जैसे ही वह अपना मुँह खिड़की के पास ले गए, भूखे घोड़े ने उनकी दाढ़ी को सूखी घास समझकर दबोच लिया और खींचने लगा।
राजगुरु दर्द से चिल्ला उठे। किसी तरह सैनिकों ने राजगुरू को घोड़े से अलग किया। फिर जैसे-तैसे वह घोड़े को पकड़कर दरबार ले आए। राजा ने जब घोड़े को देखा, तो वह दंग रह गए। इतने समय से उचित खुराक न मिल पाने के कारण उसका शरीर सूख चुका था। वह बहुत कमजोर जान पड़ रहा था।
अपने घोड़े का यह हाल देख राजा क्रोधित स्वर में बोले- “तेनालीराम, तुमने घोड़े की ये क्या हालत कर दी है?”
तेनालीराम शांत स्वर में बोले- “महाराज, मुझे क्षमा कीजिए, लेकिन जितना धन घोड़े की देखभाल के लिए मुझे दिया गया था उतने में जितना दाना-पानी मैं इसे दे सकता था, मैंने दिया। बाकी दरबारी और प्रजाजन तो आपके डर से अपना पेट काटकर भी घोड़ा पालते रहे। कई प्रजाजनों ने पैसे न होने के कारण कर्ज लेकर भी घोड़ों की देखभाल की है…
..महाराज, एक राजा का धर्म प्रजा की देखभाल और रक्षा करना होता है, न कि उनपर अतिरिक्त बोझ डालकर उन्हें कमजोर करना। इन घोड़ों को बलवान व तंदरुस्त बनाये रखने में आपकी प्रजा दुर्बल हो गई है और प्रजा की यही दुर्बलता आपको भी दुर्बल कर सकती है। जिस तरह इस दुर्बल घोड़े ने भूख से व्यथित होने के कारण राजगुरू की दाढ़ी को भी नहीं छोड़ा, उसी तरह कर्ज और गरीबी से व्यथित ये प्रजा बगावत करके आपको भी दंडित कर सकती है महाराज! मुझे उम्मीद है आप मेरी बात को समझ चुके हैं महाराज।”
तेनालीराम की बात सुनकर राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने सभी दरबारियों और प्रजाजनों से अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी तथा सभी को उनके खर्च की पूरी भरपाई दी। जिनपर कर्ज हो गया था उनका कर्जा भी राजा ने उतार दिया। साथ ही तेनालीराम का आभार मानते हुए राजा ने उन्हें दरबार में सम्मानित किया।
राजगुरू की तेनालीराम के प्रति जलन दरबार में किसी से छुपी नहीं थी। तेनालीराम को सम्मानित होता देख वे गुस्से में अपनी दाढ़ी खींचने लगे, तब एक दरबारी ने मजाकिया अंदाज में उनसे कहा- “अरे राजगुरू जी, जरा आराम से दाढ़ी खींचिये। आधी तो घोड़ा खा ही चुका है, खींचने पर कहीं पूरी ही न हाथ में आ जाए…”
दरबारी की बात पर अगल-बगल के दरबारी भी ठहाका लगाकर हँस पड़े।












प्रातिक्रिया दे