गर्म पकौड़ी कविता – निराला का स्वादभरा व्यंग्य

गर्म पकौड़ी कविता में निराला ने खाने के लालच और स्वाद की मजेदार प्रस्तुति की है। यह कविता हास्य और व्यंग्य का सुंदर उदाहरण है।

गर्म पकौड़ी
ऐ गर्म पकौड़ी!
तेल की भुनी,
नमक-मिर्च की मिली,
ऐ गर्म पकौड़ी!

मेरी जीभ जल गई,
सिसकियाँ निकल रहीं,
लार की बूँदें कितनी टपकीं,
पर दाढ़ तले तुझे दबा ही रक्खा मैंने
कंजूस ने ज्यों कौड़ी।

पहले तूने मुझको खींचा,
दिल लेकर फिर कपड़े-सा फींचा,
अरी, तेरे लिए छोड़ी,
बम्हन की पकाई
मैंने घी की कचौड़ी।

इस कविता में कवि ‘निराला’ जी ने पकौड़ी खाने के लालच और स्वाद का मजाकिया वर्णन किया है। कविता का संदेश यह है कि स्वाद के मोह में इंसान तकलीफ सहकर भी मजा लेता है- जैसे जीभ जल गई, पर पकौड़ी नहीं छोड़ी। यह कविता एक हल्के-फुल्के अंदाज में लालच, स्वाद और कंजूसी पर कटाक्ष करती है।

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