सवेरे की सौगात

यह कविता “सवेरे की सौगात” सुबह की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और आशाओं से भरे नए दिन का कोमल चित्रण प्रस्तुत करती है।

सुबह की प्रकृति है एक कोमल गीत,
हर किरण में बसता है जीवन का मीत।
ओस की बूँदें, जैसे मोती हों धरती पर,
हवा भी चलती है प्रेम की लहर भर।

पंछी चहचहाते हैं स्वागत में प्रभात का,
फूलों से महकता है आँगन दिन के साथ का।
सूरज मुस्काता है पहाड़ियों के पार,
मानो कहता हो — “जग जा अब संसार।”

पेड़ों की शाखों पर नाचते हैं सपने,
हर पत्ता कहता है — “चलो कुछ अपने।”
नदी की कल-कल भी गुनगुनाती है बात,
जैसे कोई माँ सुना रही हो सौगात।

सुबह की ये प्रकृति, शांत, पावन, नई,
हर दिल में भरती है उम्मीदें कई।
जो समझ सके इसकी मौन ज़बान,
उसे मिल जाए जीवन का वरदान।


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