चलो झुकें उस ध्वज तले
इस प्रेरणादायक देशभक्ति कविता में वीरों के बलिदान, आज़ादी की गाथा और विकसित भारत का सपना भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
चलो झुकें उस ध्वज तले,
जिसमें बसा है हिंदुस्तान।
हर साँस कहे ‘जय हिंद’ जब,
गूँज उठे धरती-आसमान।।
माटी में है उस लहू की महक,
जिसने दिखाया था साहस अनूप।
सीने पर गोली खाकर भी,
हँसते रहे जो वीर स्वरूप।।
उनकी गाथा, उनका गौरव,
अमर रहे उनका बलिदान।
हृदय में गूँजता रहे सदा,
उनका यश, कीर्ति और मान।।
है ये आजादी के बाद की बात,
देश हमारा जब था कमजोर।
दुश्मनों ने किए थे हमले,
जीत की थी कोशिश पुरजोर।।
भारत ने फिर शौर्य दिखाया,
दिया उन्हें मुंहतोड़ जवाब,
जीती हमने हर एक जंग।
तोड़े उनके सारे ख्वाब।।
कहने को तो हो चुके,
आजादी के उनासी साल।
शिक्षा, न्याय और रोजगार में,
अब भी खड़े हैं कई सवाल।।
मंजिल अभी अधूरी है,
जंग अभी भी जारी है।
विकसित भारत की राह पर,
चलने की तैयारी है।।
आने वाले कल में होगी,
नए भारत की जय-जयकार।
न कोई भूखा, न कोई रोगी,
न होगा कोई लाचार।।
मेहनत का फल हाथों में होगा,
कर्मठ होगा हर इंसान।
हर घर में खुशहाली होगी,
पूरे होंगे सब अरमान।।
चलो झुकें उस ध्वज तले,
जिसमें बसा है हिंदुस्तान।
हर साँस कहे ‘जय हिंद’ जब,
गूँज उठे धरती-आसमान।।












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