सूखी नदी में नाव का सफर – उम्मीद और दृढ़ता

सूखी नदी में उम्मीद और दृढ़ता के सफर को जानें। पढ़ें हमारी कविता जो नाव की कठिन यात्रा और मंज़िल तक पहुँचने की कहानी कहती है।

सूखी नदी में नाव चल नहीं सकती
चप्पू चलाना भी सार्थक नहीं होता
मांझी के प्रयास बेकार जाते हैं
मंज़िल मिल नहीं पाती
पार कैसे उतरे नाव
नीर के बिना?

निराशा.. असफलता…
मांझी और मुसाफिरों की
बढ़ती ही जाती है… बढ़ती ही जाती है..


प्रगति रुकती है… रुकती ही जाती है
नाविक को बढ़ा नहीं सकता
किसी भी नाव को
जब तक मन -सरिता में
आस्था-प्रेम, विश्वास और श्रद्धा का
पावन नीर न होगा,
पार उतरने की चाह न होगी 
आगे बढ़ने का उत्साह भी तो हो
तभी तो पार उतरेगी  “तेरी”
आगे बढ़ेंगे हम… आगे बढ़ेंगे हम…
मांझी के प्रयास और चाह मुसाफिर की..m
दोनों का साथ ही… मंजिल की
 चुनौती है…
मिलने दो इनको लक्ष्य भी
सूखी है नदी अभी
खूब उसे भरने दो
खूब उसे भरने दो 
तेरी पार उतरने दो

सूखी नदी में नाव की यात्रा

यह कविता सूखी नदी में नाव की प्रेरणादायक यात्रा का वर्णन करती है, जहाँ उम्मीद और दृढ़ता के बिना प्रयास बेकार हो जाते हैं। मांझी और मुसाफिरों की निराशा और असफलता बढ़ती ही जाती है, लेकिन आस्था, प्रेम, विश्वास और श्रद्धा का पावन नीर मिलते ही नाव अपनी मंजिल की ओर बढ़ने लगती है। यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा और दृढ़ संकल्प भरना चाहिए, ताकि हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।

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