शिक्षक दिवस की प्रेरक कहानी: गुरु का सन्देश
5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर स्कूल में हुआ एक खास आयोजन। वरिष्ठ शिक्षक ने बच्चों से पूछा – “तुम बड़े होकर क्या बनोगे?” इस प्रेरक कहानी में जानें उनका भावुक संदेश।
5 सितम्बर की सुबह स्कूल में कुछ अलग ही चहल-पहल थी। हर तरफ रंग-बिरंगे फूलों की सजावट एवं कक्षाओं की दीवारों पर रंगीन कागजों की झालरें लटक रहीं थी। सभी बच्चों के चेहरों पर उमंग की चमक थी। सुबह की प्रार्थना सभा के बाद बच्चों ने गूँजती आवाज में राष्ट्रीय गीत गाया और फिर प्रधानाचार्य ने सभी को शिक्षक दिवस की बधाईं दीं।
सबसे मजेदार दृश्य तो तब बना जब सीनियर कक्षा के बच्चों ने पूरे दिन के लिए शिक्षकों की भूमिका निभाई। कोई गणित पढ़ा रहा था तो कोई हिंदी समझा रहा था, कोई अनुशासन सिखा रहा था तो कोई विज्ञान के पाठ पढ़ा रहा था। छोटे बच्चे अपने ‘नये शिक्षकों’ को देखकर हँस भी रहे थे और सीख भी रहे थे। पूरे स्कूल में मानो शिक्षा का एक नया उत्सव चल रहा हो।
शाम को स्कूल के प्रांगण में भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। दीप प्रज्वलन के बाद कार्यक्रम की शुरुआत हुई। सबसे पहले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को नमन किया गया। उसके बाद बच्चों ने मनमोहक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। एक-एक करके गीत, नाटक, नृत्य और भाषण प्रस्तुत हुए। कार्यक्रम के अंत में सभी शिक्षकों को उपहार और पुष्प देकर सम्मानित किया गया। सभी शिक्षकों की आँखों में गर्व और स्नेह झलक रहा था।
अंत में स्कूल के सबसे वरिष्ठ शिक्षक मंच पर आए। सफेद बाल, गंभीर मुखमुद्रा और तेजस्वी आँखों में एक विशेष आभा लिए उन्होंने बोलना शुरू किया- “बच्चो, आज तुम सबने जिस तरह से शिक्षक दिवस मनाया है, वह वास्तव में प्रशंसनीय है। मेरे जीवन में यह दिन हमेशा विशेष रहेगा। लेकिन अब मैं तुम सबसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। बताओ, तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”
उसके बाद नीचे बैठे बच्चों ने आवाज लगाना शुरू किया- किसी ने कहा डॉक्टर, किसी ने इंजीनियर, कोई बोला आईएएस, कोई वैज्ञानिक, कोई पायलेट तो कोई व्यापारी। वरिष्ठ शिक्षक ने एक गहरी साँस ली और कहा- “बच्चो, तुम्हारे सपने बहुत बड़े और अच्छे हैं, लेकिन एक बात ने मुझे बहुत दुखी किया है। तुममें से किसी ने भी यह नहीं कहा कि मैं आगे चलकर शिक्षक बनूँगा! आज हम शिक्षक दिवस मना रहे हैं। हम उन गुरुओं को याद कर रहे हैं जिन्होंने हमें जीवन की दिशा दिखाई- लेकिन भविष्य में शिक्षक बनने की बात कोई नहीं करता। यह केवल इस सभा की सच्चाई नहीं है, बल्कि पूरे देश की तस्वीर है…
..मुझे गर्व है कि हमारे देश के बच्चे बड़े पदों और ऊँचाइयों को पाना चाहते हैं। यह गलत नहीं है, बल्कि प्रशंसनीय है- लेकिन शिक्षक बनने को एक आदर्श विकल्प के रूप में न देखना गलत है। अगर आने वाली पीढ़ियों को योग्य और समर्पित शिक्षक नहीं मिलेंगे तो उनकी राह कौन रोशन करेगा? अगर देश को अच्छे डॉक्टर, ईमानदार अधिकारी, महान वैज्ञानिक या सफल व्यापारी चाहिए तो सबसे पहले उसे अच्छे शिक्षक तैयार करने होंगे- क्योंकि हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी शिक्षक का योगदान होता है।”
यह कहते-कहते उनकी आवाज भारी हो गई। थोड़ी देर ठहरकर उन्होंने आगे कहा- “मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में युवा पीढ़ी इस ओर अवश्य ध्यान देगी। कुछ बच्चे यह ठानेंगे कि वे भी गुरु बनेंगे और आने वाली पीढ़ी को मार्गदर्शन देंगे। तभी हमारा समाज और राष्ट्र सही मायनों में प्रगति कर पाएगा।”
उनका भाषण समाप्त होते ही पूरा प्रांगण तालियों से गूँज उठा। ताली की वह गड़गड़ाहट साधारण नहीं थी, उसमें एक अलग ही जोश था। ऐसा लग रहा था जैसे बच्चों ने उनकी हर बात को गंभीरता से सुना, समझा और अपने दिल में उतार लिया हो। कार्यक्रम समाप्ति के बाद भी मास्टर जी की बातें विद्यार्थियों के जहन में चल रही थीं। उस शाम की गूँज देर तक सबके मन में बनी रही- जैसे समय ने उस दिन को हमेशा के लिए खास बना दिया हो।












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