रंग-बिरंगी मिठाइयाँ – तेनालीराम की चतुराई की कहानी
रंग-बिरंगी मिठाइयों के उत्सव में तेनालीराम ने अपनी बुद्धि और समझदारी से विजयनगर की जनता को हानिकारक रासायनिक रंगों से बचाया। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा उत्सव वही है जो स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ मनाया जाए।
वसंत ऋतु की सुगंध पूरे विजयनगर साम्राज्य में छाई हुई थी। बाग-बगीचे फूलों से लदे हुये थे और हर तरफ एक नई ऊर्जा महसूस हो रही थी। ऐसे ही सुखद मौसम में राजा कृष्णदेवराय अपने प्रिय दरबारी तेनालीराम के साथ राजमहल के बगीचे में टहल रहे थे।
राजा बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने मुस्काते हुए तेनालीराम से कहा- “तेनाली, वसंत के समय वातावरण कितना मनोहर लगने लगता है। हम चाहते हैं कि हमारी प्रजा भी इस मौसम को खुलकर जिये इसलिए हम एक ऐसा भव्य उत्सव मनाना चाहते हैं जिसमें हमारे राज्य का प्रत्येक नागरिक शामिल हो। उत्सव के दौरान नगर की हर गली, हर चौक पर उल्लास का वातावरण हो ताकि विजयनगर का नाम दूर-दूर तक गूँजे।”
तेनालीराम बोले- “महाराज, आपकी यह सोच सचमुच सराहनीय है। यदि प्रजा को एक साथ आनंद मनाने का अवसर मिले तो उनके मन में आपके प्रति प्रेम और निष्ठा बढ़ेगी।”
राजा ने तुरंत उत्सव की घोषणा कर दी। नगर को शीघ्र ही सजाया जाने लगा। सड़कों पर चूना छिड़का गया, इमारतों को दीपकों और झालरों से सजाया गया, बाजारों को फूलों से महकाया गया। नगरवासियों में उत्साह की लहर दौड़ गई। उत्सव को और रोचक बनाने के लिए राजा ने फरमान जारी किया कि सभी हलवाई अपनी दुकानों पर रंग-बिरंगी मिठाइयाँ बनायें। यह आदेश सुनते ही हलवाई नए-नए रंगों की मिठाई बनाने में जुट गए।
लेकिन जैसे-जैसे उत्सव का दिन नजदीक आता गया, वैसे-वैसे एक अजीब-सी बात होने लगी। दरअसल, काफी दिनों से तेनालीराम दरबार में दिखाई ही नहीं दे रहे थे। दिन बीते, सप्ताह बीता, लेकिन उनका कहीं कुछ अता-पता न था। राजा भी अब चिंतित हो उठे। उन्होंने तुरंत सैनिकों को तेनाली को खोजने का आदेश दिया।
सैनिक कई दिनों तक तेनालीराम की खोज में लगे रहे। अंततः एक दिन वे दरबार लौटे और हाथ जोड़कर महाराज से बोले- “महाराज, तेनालीराम जी मिल गए हैं। उन्होंने कपड़ों की रंगाई की दुकान खोल ली है और पूरा दिन वहीं रहते हैं। जब हमने उनसे दरबार आने को कहा तो उन्होंने आने से इनकार कर दिया।”
यह सुनकर राजा का चेहरा तमतमा उठा। उन्होंने तेनालीराम को बलपूर्वक पकड़कर लाने का आदेश दिया। आदेश का पालन हुआ। सैनिकों ने तेनालीराम को पकड़कर दरबार में प्रस्तुत किया। राजा ने कठोर स्वर में तेनालीराम से पूछा- “तेनाली! तुमने शाही आदेश का पालन क्यों नहीं किया? और एक बात बताओ, दरबार की गरिमा छोड़कर रंगरेज की दुकान खोलने का क्या अर्थ है? क्या तुम्हें दरबार में मान-सम्मान और सुख-सुविधा नहीं मिलती?”
तेनालीराम ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया- “महाराज, दरअसल मैंने यह काम मज़बूरी में शुरू किया है। राष्ट्रीय उत्सव के लिए जैसे ही आपने मिठाइयों को रंग-बिरंगा बनाने का आदेश दिया, वैसे ही अधिकांश हलवाई इस कार्य में जुट गए…लेकिन समस्या यह है कि वे लोग सस्ते और हानिकारक रासायनिक रंग खरीदकर मिठाइयाँ रंग रहे हैं। ये वही रंग हैं, जिन्हें कपड़े रंगने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मैंने जब देखा कि यह रंग मिठाइयों में घुलने लगे हैं, तो मुझे डर लगा कि प्रजा बीमार न पड़ जाए। इसलिए मैंने रंगाई की दुकान खोलकर लोगों का ध्यान इस ओर खींचने की युक्ति बनाई।”
राजा के चेहरे का क्रोध धीरे-धीरे चिंता में बदल गया। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा- “तो तुम्हारा आशय यह है कि मेरे आदेश का गलत फायदा उठाकर मिठाई बनाने वाले जनता की जान से खेल रहे हैं?”
तेनालीराम ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया- “जी महाराज, मिठाइयों में केवल खाने योग्य प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग होना चाहिए, अन्यथा यह उत्सव आनंद की बजाय बीमारी का कारण बन जाएगा।”
राजा कुछ क्षण मौन रहे। फिर गंभीरता से बोले- “तेनाली, तुम्हारी बुद्धिमानी ने एक बार फिर प्रजा को अनहोनी से बचा लिया। मैं आदेश देता हूँ कि कोई भी हलवाई मिठाई बनाने के लिए अब हानिकारक रंगों का प्रयोग न करे। यदि कोई ऐसा करता पाया गया तो उसे दोषी मानकर कठोर दंड दिया जाएगा।”
राजा का आदेश सुनते ही तेनालीराम ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। उनकी वही चिर-परिचित मुस्कराहट चेहरे पर थी। इस प्रकार तेनालीराम ने अपनी बुद्धिमत्ता से न केवल राजा की भूल सुधार दी, बल्कि विजयनगर की जनता को एक बड़े संकट से भी बचा लिया।












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